66 साल पुरानी कहानी याद आई राजस्थान में फिर युवा बनाम वरिष्ठ की लड़ाई

बीबीसीखबर, जयपुरUpdated 15-07-2020
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 राजस्थान में कांग्रेस के मौजूदा सियासी संकट ने लगभग छह दशक पुरानी ऐसी ही एक कहानी को फिर ताजा कर दिया है। उस समय मुख्यमंत्री थे जयनारायण व्यास। उन्होंने भी मुख्यमंत्री रहते हुए कई सियासी झंझावत झेले थे। व्यास को देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का समर्थन हासिल था। बावजूद इसके, जब उनके खिलाफ पार्टी के भीतर ही बगावत हुई तो उन्हें राज्य की राजनीति से ओझल होना पड़ा। वह भी एक युवा विधायक की वजह से। आइए इसे और सरल भाषा में समझते हैं।

साल 1954 में राजस्थान के मुख्यमंत्री पर जयनारायण व्यास आसीन थे। ठीक वैसे ही जैसे इस समय अशोक गहलोत। व्यास जोधपुर से विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए थे। उन्हें तत्कालीन युवा नेता मोहनलाल सुखाड़िया ने चुनौती दी थी। सुखाड़िया उस समय 38 वर्ष के थे और विधायक भी थे।

जयनारायण व्यास 26 अप्रैल 1951 को पहली बार राजस्थान के मुख्यमंत्री बने थे। हालांकि इस पद पर वो ज्यादा समय तक नहीं रह पाए। वजह थी चुनाव में पराजय। लेकिन इस पराजय की कहानी भी ऐतिहासिक है।

1951 के अंत में देश के पहले चुनावों की प्रक्रिया शुरू हुई थी। ज्यादातर जगहों पर कांग्रेस को बढ़त हासिल थी। मगर राजस्थान में मुकाबला जोरदार था। वजह थी यहां के राजघराने, जो कांग्रेस विरोधी थे। यहां के जागीरदार और राजा जनसंघ और रामराज्य परिषद के टिकट पर या फिर निर्दलीय चुनाव में उतर आए थे। इनका नेतृत्व कर रहे थे जोधपुर के राजा हनवंत उर्फ हणूत सिंह। इन चुनावों में जयनारायण व्यास दो सीटों से लड़े थे। एक जालौर-ए और दूसरी जोधपुर शहर-बी।

 

राजा हनवंत उर्फ हणूत सिंह ने व्यास के लिए जबरदस्त तैयारी की थी। वो जोधपुर से खुद लड़े और जालौर से जागीरदार माधो सिंह को लड़वाया था। नतीजा यह रहा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास दोनों सीटों से हार गए। हालांकि राज्य में बहुमत कांग्रेस को मिला।

 

कांग्रेस में उस समय व्यास खेमा हावी था। इस वजह से व्यास समर्थक हारने के बावजूद उन्हें ही मुख्यमंत्री बनाने पर अड़े थे। लेकिन उस समय राजनीति में नैतिकता हुआ करती थी, इसलिए व्यास पर्दे के पीछे चले गए। पिछली सरकार में उनके डिप्टी रहे टीकाराम पालीवाल को मुख्यमंत्री बनाया गया। कुछ महीनों बाद ही किशनगढ़ से विधायक चांदमल मेहता ने इस्तीफा देते हुए जयनारायण व्यास को वहां से उपचुनाव लड़ने का न्योता दिया। व्यास इस उपचुनाव में जीत गए और फिर से राजस्थान के मुख्यमंत्री बन गए।

 

हालांकि इस बार भी सत्तासुख उनकी किस्मत में बहुत दिन नहीं रहा। व्यास के मुख्यंत्री बनने के दो साल के अंदर 1953 में विधायक बगावती हो गए। बागी विधायक एक 38 साल साल के युवा विधायक मोहन लाल सुखाड़िया के पीछे जुट गए थे। विरोध बढ़ा तो हाईकमान ने दखल दिया। विधायक दल की मीटिंग हुई और करीबी मुकाबले में व्यास हार गए।

 

सवाईमानसिंह टाउन हॉल स्थित पुरानी विधानसभा में 13 नवंबर, 1954 को हुई विधायक दल की बैठक में मत विभाजन हुआ था। जिसमें सुखाड़िया के पक्ष में 59 और व्यास के समर्थन में 51 मत पड़े थे। व्यास इस्तीफा देकर तांगे में अपना सामान भरकर पोलोविक्ट्री के पास अपने मित्र की एक होटल में आ गए थे। इसके बाद जयनारायण व्यास एक बार राज्यसभा सदस्य भी बने थे। इसके अलावा दो साल तक राजस्थान के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे। मार्च 1963 में दिल्ली में उनका निधन हो गया था।

 

जोधपुर से राजस्थान तक

जयनारायण व्यास 1948 में जोधपुर राज्य की लोकप्रिय सरकार के मुख्यमंत्री बने थे। पर यह सरकार एक साल ही चली थी, क्योंकि 30 मार्च 1949 को 18 रियासतों को मिलाकर राजस्थान राज्य बना दिया गया था।

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