संसद की निष्क्रियता लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा

बीबीसीखबर, संपादकीयUpdated 04-07-2018
संसद

वरिष्ठ पत्रकार अनिल निगम की कलम से

सुप्रीम कोर्ट ने अपने ताजा फैसले में कहा है कि किसी भी प्रदेश में कार्यकारी डीजीपी नियुक्‍त नहीं होंगे। इससे एक बात तो साबित हो गई है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्‍व वाली केंद्र सरकार, जिसने शासन तंत्र को दुरुस्‍त करने का बीड़ा उठाया था, उसने भी पुलिस सुधारों के प्रति गंभीरता नहीं दिखाई। यही कारण है कि आजादी के 71 वर्ष बाद भी हमारे देश में एकीकृत पुलिस अधिनियम नहीं है, जिसमें पूरे देश में एक जैसी पुलिस व्‍यवस्‍था हो। दिलचस्‍प यह है कि अंग्रेजों के शासनकाल में संपूर्ण देश के लिए एक ही पुलिस व्‍यवस्‍था थी। जिस तरीके से सुप्रीम कोर्ट को पुलिस सुधार संबंधी बार-बार आदेश जारी करने पड़ रहे हैं, उससे यह भी साबित हो गया है कि जो काम हमारी व्‍यवस्‍थापिका यानि संसद को करना चाहिए, वह काम हमारे देश की न्‍यायपालिका कर रही है। लेकिन न्‍यायपालिका की अतिसक्रियता और संसद की निष्क्रियता किसी भी लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था के लिए हितकर नहीं है।

सर्वोच्‍च न्‍यायालय के मुख्‍य न्‍यायाधीश दीपक मिश्रा, एएम खानविल्‍कर एवं डीवाई चंद्रचूड़ की खंडपीठ ने पुलिस सुधार के 2006 के पूर्व फैसले में केंद्र सरकार की संशोधन अर्जी पर सुनवाई के बाद राज्‍यों में डीजीपी की नि‍युक्ति के बार में कहा कि राज्‍य सरकारें कार्यकारी डीजीपी नियुक्‍त नहीं कर सकतीं। नियुक्ति की प्रक्रिया के संबंध में अदालत ने कहा कि डीजीपी की सेवानिवृत्ति के तीन महीने पूर्व केंद्रीय लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) को प्रस्‍ताव बनाकर भेजना होगा। 2006 में दिए गए फैसले के अनुसार यूपीएससी तीन अधिकारियों का एक पैनल तैयार करेगा। इस पैनल के एक अधिकारी को राज्‍य सरकार डीजीपी नियुक्‍त करेगी। जिन अधिकारियों का पैनल तैयार किया जाएगा, उसमें यह ध्‍यान रखा जाएगा कि अधिकारियों की सेवानिवृत्ति में कम से कम दो साल की सेवा अवधि बाकी हो।

सर्वोच्‍च न्‍यायालय के फैसले के पश्‍चात सबसे बड़ा सवाल यह है कि अंग्रेजों की गुलामी से मुक्‍त होने के लगभग 71 वर्ष बाद भी हम संपूर्ण देश के लिए एक पुलिस अधिनियम क्‍यों नहीं बना सके? ध्‍यातव्‍य है कि हमारे देश की पुलिस की देश को आतंकवादियों से मुक्‍त रखने, कानून व्‍यवस्‍था बनाए रखने और आपराधिक मामलों में जांच पड़ताल करने में अहम भूमिका होती है। सर्वाधिक आतंकवाद प्रभावित देशों में इराक, अफगानिस्‍तान, पाकिस्‍तान, नाईजीरिया और सीरिया के बाद भारत छठवें स्‍थान पर आता है। जितनी भी आतंकवादी और नक्‍सलवादी गतिविधियां हमारे देश में होती हैं, उससे सबसे पहले हमारी पुलिस को ही दो चार होना पड़ता है। दुर्भाग्‍यपूर्ण है कि सरकार आज भी आतंकवाद से निबटने की ठोस कार्ययोजना या रणनीति नहीं बना

पाई है।

 

1996 में दो पूर्व पुलिस महानिदेशकों ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी। इसमें यह मांग की गई थी कि सर्वोच्‍च अदालत विभिन्‍न प्रदेशों में पुलिस की खराब गुणवत्‍ता में सुधार लाने के लिए केंद्र और राज्‍य सरकारों को दिशा-निर्देश जारी करे। वर्ष 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्‍य सरकारों को सात महत्‍वपूर्ण दिशा- निर्देश जारी किए। सभी के लिए उक्‍त दिशा-निर्देशों का पालन करना आवश्‍यक बनाया गया। इसके तहत राज्‍य सुरक्षा आयोग के गठन करने का कहा गया। डीजीपी का कार्यकाल दो वर्ष निश्चित किया गया। आईजी पुलिस और अन्‍य अधिकारियों को भी एक ही पद पर रहने के लिए दो वर्ष का कार्यकाल निर्धारित कर दिया गया। इसमें पुलिस इस्‍टैबलिशमेंट बोर्ड के गठन और जांच कार्य में लगी पुलिस को कानून- व्‍यवस्‍था के काम से अलग रखने को कहा गया। इसके अलावा फैसले में राष्‍ट्रीय सुरक्षा आयोग और पुलिस शिकायत प्राधिकरण गठित करने की बात भी कही गई। लेकिन सर्वोच्‍च न्‍यायालय का 2006 का आदेश राज्‍य सरकारों, नौकरशाही और नेताओं को रास नहीं आया। 

 

राज्‍य सरकारों, नौकरशाहों और नेताओं को लगा कि अगर उन्‍होंने अदालत के आदेश को ईमानदारी से लागू कर दिया तो पुलिस पर रहने वाला उनका अंकुश समाप्‍त हो जाएगा और जिस तरह से वे अभी पुलिस पर नकेल कसकर अपने निहितार्थ सिद्ध कर लेते हैं, वे नहीं कर पाएंगे। यही कारण है कि विभिन्‍न राज्‍यों ने इस संबंध में अलग-अलग कानून बना डाले। चूंकि उक्‍त फैसले में यह कहा गया था कि राज्‍यों के मामले में ये आदेश तब तक लागू होते हैं, जब तक संबंधित राज्‍य इस पर कानून नहीं बना देता। अब इन राज्‍यों के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन करना आवश्‍यक नहीं रहा। वास्‍तविकता यह है कि चाहे प्रदेशों में डीजीपी की नियुक्ति का मामला हो या पुलिस विभाग में सुधार करने की बात हो, सभी जगह यह मजाक बनकर रह गया है।

 

यहां पर यक्ष प्रश्‍न यह है कि कार्यपालिका और संसद इस मामले पर मूकदर्शक क्‍यों बनी हुई है? क्‍या उसकी मंशा पुलिस तंत्र में सुधार करने की नहीं है? इतने महत्‍वपूर्ण मुद्दे पर चुप्‍पी साधे रहने का मतलब क्‍या है? कार्यपालिका और संसद अपने अधिकारों और कर्तव्‍यों के प्रति इतना उदासीन क्‍यों है? ऐसा नहीं है कि इसके लिए दोषी सिर्फ सत्‍ताधारी दल है। विपक्ष में बैठे नेताओं ने भी कभी इसकी बाबत कोई गंभीरता से प्रयास नहीं किए। वास्‍तविकता तो यह है कि संसद और कार्यपालिका में काबिज राजनेताओं को अपने निहितार्थ त्‍याग कर समाज और राष्‍ट्र हित में काम करना चाहिए। संसद और कार्यपालिका की उदासीनता का परिणाम कहीं यह हो कि हर महत्‍वपूर्ण विषय पर दिशा-निर्देश सुप्रीम कोर्ट ही जारी करने लगे।

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