अंधविश्वास से घिरा बाजार, अफवाहों की गिरफ्त में समाज

बीबीसीखबर, संपादकीयUpdated 17-07-2018
अंधविश्वास

डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज

इक्कीसवीं सदी में जब हम उच्च प्रौद्योगिकी से लैस हैं और ज्ञान के क्षेत्र में नये परचम लहराने का दावा करते हैं तब यदि अफवाहों के आधार पर समाज हिंसा और अपराध पर उतर आता है तो यह गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए। यह इसलिए भी जरूरी है कि इनमें से कुछ घटनाएं ऐसी हैं जिनमें एक समुदाय विशेष को निशाना बनाया जा रहा है जिसके कारण सामाजिक और राजनीतिक वातावरण खराब हो रहा है। दूसरी वे घटनाएं हैं जो हमारे अंधविश्वास को और मजबूत करती हैं। तीसरी घटनाएं जो सबसे अधिक खतरनाक हैं वे हैं जिनमें लोग एक विवेकहीन भीड़ में तब्दील होकर केवल सुनी-सुनाई बातों पर यकीन करते हुए किसी को भी मार डालने पर उतर आते हैं। इस तरह की कुछ घटनाएं हाल ही में देश के अलग-अलग क्षेत्रों में हुई हैं जो अधिक चिंता का विषय कही जा सकती हैं।

एक बहुत पुरानी कथा है कि एक सुबह अचानक गांव में हल्ला मचा कि कव्वा कान ले गया और पूरा गांव कव्वे के पीछे दौड़ पड़ा बिना यह देखे-जाने कि किसका कान ले गया और ले भी गया या नहीं। इसी से मिलता-जुलता एक प्रसंग श्रीलाल शुक्ल ने रागदरबारी में लिखा है। किस्सा कुछ इस तरह से है कि गांव की कच्ची पगड़ंड़ी पर किनारे उगी कंटीली झांडियों के रास्ते में बाधा होने पर एक राहगीर ने कुछ डालियों को एक धागे से बांध कर एक तरफ कर दिया। उसे ऐसा करते हुए एक व्यक्ति ने दूर से देख लिया। पास आकर जब उसने झाड़ी की डाल पर धागा बंधा देखा तो उसे लगा कि ऐसा करने का कोई विशेष प्रयोजन है। उसने भी दूसरी डालों को धागे से बांध दिया। इस तरह देखा-देखी लोगों ने उन झाड़ियों पर धागा बांधना शुरू कर दिया और वह जगह अचानक आस्था का एक केंद्र बन गयी। इस तरह की घटनाएं बहुत लोगों ने अपने जीवन में देखी होंगी जब अचानक किसी स्थान पर किसी पत्थर पर सिंदूर लगा होने या फूल चढ़े होने पर लोग वहां पूजा करने लगे। इस प्रकार की घटनाएं समाज को कोई हानि नहीं पहुंचातीं परंतु जो घटनाएं हाल में सामने आयी हैं वह जरूर चिंता का विषय है। 

पिछले कुछ दिनों से आ रही अनियंत्रित सामूहिक हिंसा की खबरें सामाजिक ताने-बाने के लिए एक बड़ा खतरा दिखाई दे रही हैं। यह खतरा और भी अधिक बढ़ जाता है जब हम पाते हैं कि इसमें नये संचार माध्यमों और सोशल मीडिया की अनियंत्रित भूमिका सामने आ रही है। पिछले दिनों आंध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, त्रिपुरा आदि में बच्चा चोरों की अफवाह के चक्कर में अनियंत्रित उन्मादी भीड़ ने 30 से अधिक लोगों की हत्या कर दी। यह संख्या तो सरकार ने स्वीकार की है परंतु बहुत सारी ऐसी घटनाओं को तो सरकार ने अपने बयान में शामिल ही नहीं किया है, खासतौर पर गोकशी के संदेह में की गयी हत्याओं को। झारखंड, उत्तर प्रदेश सहित कई जगहों पर गौकशी की अफवाह के कारण कई लोगों की हत्या कर दी गई। महाराष्ट्र के धूले जिले में एक जुलाई की घटना की विडम्बना यह है कि एक बस से उतर रहे पांच लोग एक बच्ची से कुछ पूछ रहे थे। उससे पहले लोगों में यह बात फैलाई गयी थी कि बच्चों का अपहरण करने वाला एक गिरोह आने वाला है। बस से उतरे पांच लोगों के लिए, जो उस इलाके में नये थे, एक बच्ची से कुछ पूछना ही गुनाह हो गया। और हाल ही में कर्नाटक लोगों की भीड ने ऐसे युवक को मार डाला जो एक बच्चे को चाकलेट दे रहा था। इसी प्रकार असम व त्रिपुरा में कुछ ऐसी महिलाओं को लोगों की भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला जिनपर बच्चों को उठाने का शक था। इसी तरह कई अर्द्धविक्षिप्त लोगों को भीड़ ने मार डाला।

कहते हैं कि भीड़ का अपना कोई चरित्र नहीं होता, वह उसी तरफ दौड़ पड़ती है जिस तरफ हांक दी जाती है। अपनी सात दशक की लोकतांत्रिक यात्रा में हमने अनेक बार यह देखा है कि मतदाता एक जाति या धर्म की भीड़ में बदले जाते रहे हैं। इसके लिए भी इसी तरह की अफवाहों या भ्रांत प्रचारों का सहारा लिया जाता रहा है। इस काम में उससे जो अराजक और विचारहीन राजनीति जन्मी उसके दुष्परिणाम हम देख चुके हैं। इस तरह के प्रचार में संचार माध्यमों की भूमिका कारगर रही है। यह बात सामने आयी है कि बच्चा चोरों के बारे में असम से लेकर तमिलनाडु तक एक ही तरह की सूचना व्हाट्सएप के जरिये फैलाई गयी। इससे इसमें किसी तरह की साजिश होने का शक होना गलत नहीं है। एक समय था अफवाहें बहुत तेजी से नहीं फैल पाती थीं और फैलती भी थीं तो केवल एक क्षेत्र में। परंतु संचार माध्यमों के विकास व विस्तार ने अब समाज विरोधी तत्वों को अफवाहों को एक साथ पूरे देश में फैलाना आसान कर दिया है। इस तरह की अफवाहें और तेजी से फैलती व अपना असर दिखाती हैं जब वे लोगों के परिवार से या उनकी जाति-धर्म से संबंधित होती हैं। बहुत साल पहले एक दिन ऐसे ही पूरे देश में यह अफवाह फैलाई गई थी कि गणेशजी दूध पी रहे हैं और देखते ही देखते पूरा देश दूध लेकर दौड़ पड़ा था। ऐसा ही कुछ मंकी मेन के मामले में हुआ था जब दिल्ली सहित कई शहरों में लोगों ने इस अफवाह को सफल बनाने में योगदान दिया था कि कोई बंदर जैसा मनुष्य है जो लोगों पर हमला कर रहा है। उसके बाद चोटी काटने की घटनाएं सामने आयीं। उनमें कितनी सच्ची थीं और कितनी छूटी इसका आज तक पता नहीं चला, बस रोज अखबारों में खबरें छपने लगीं। फिर अचानक जैसे यह खबरें आने लगी थीं उसी तरह अचानक बंद भी हो गयीं। इन अफवाहों की आड़ में कुछ लोगों ने अपने निहित स्वार्थ पूरे किये और मौका मिलते ही अपनी दुकान बढ़ा कर चल दिये। ऐसा किसी एक समुदाय में ही नहीं हो रहा है। इस तरह की घटनाएं प्रत्येक समुदाय में देखने को मिलती हैं। कुछ साल पहले की बात है जब उŸार प्रदेश के देवबंद में रेल की पटरियों पर कुरान के पन्ने फाड़कर फेंकने की अफवाह ने लोगों को हिंसक बना दिया था। इसी प्रकार ट्रेन की टक्कर से एक छात्र की मौत को लोगों ने समुदाय विशेष पर हमले के रूप में प्रचारित कर हिंसा फैलाई थी।

पहले इस तरह की घटनाएं कभी-कभार होती थीं परंतु पिछले कुछ सालों में देखने में आ रहा है कि ये घटनाएं थोड़े-बहुत बदलाव के साथ, बढ़ती जा रही है। यह उम्मीद की जाती रही है कि शैक्षिक विकास और आर्थिक तरक्की से हम ऐसे समाज का निर्माण करने में सफल होंगे जो तर्कसम्मत होगा। परंतु हो इसका उल्टा रहा है। हम जितना विकास करते जा रहे हैं उतने ही अंधविश्वासी और विवेकहीन भीड़ में बदलते जा रहे हैं। फिर यह मामला केवल हाल की अमानवीय घटनाओं तक सीमित नहीं है। आये दिन इंटरनेट पर ऐसी गलत सूचनाएं प्रसारित हो जाती हैं जिनकी सत्यता जांचे बगैर उनपर यकीन कर लेते हैं। इस तरह की सूचनाओं में एक तरफ किसी खास समुदाय के बारे में भ्रामक जानकारी होती है या किसी उत्पाद के बारे में, पर साथ ही कई बार इस तरह की सूचनाएं कुछ खास तरह की धार्मिक आस्थाओं को जगाने-भड़काने का काम भी करती हैं। कई बार लोगों ने इस तरह की जानकारी मेरे साथ साझी की और जब मैंने उनकी सत्यता जानने के लिए दी गयी वेबसाइट पर जाकर देखा तो वहां वैसी कोई सूचना नहीं थी। लोगों के लिए किसी भी सूचना की सत्यता को जांचने से अधिक आसान होता है उस पर यकीन करना। और यही यकीन ही हमें विवेकहीन भीड़ में बदलने का काम करता है। अब जब सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए रोकथाम के लिए पहल की है तो यकीनन यह घटनाएं बंद हो जाएंगीं। हर बार कुछ समय के बाद वह बंद होती रही हैं परंतु कुछ समय बाद कोई और अफवाह अपना आकार लेने लगती है और देखते ही देखते समाज के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर देती है।

 

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