बहुत याद आएंगे नीरज

बीबीसीखबर, संपादकीयUpdated 21-07-2018
बहुत

डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज

गोपाल दास नीरज के लिखे फिल्मी गीत सुने तो थे परंतु जब उन्हें पहली बार मंच पर सुना और कुछ पत्रिकाओं में उनकी गजलें पढ़ीं तो पता चला कि वे क्या हैं। अमूमन फिल्मों में गीत लिखने वालों को बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता और इसी कारण जां निसार अख्तर तक को लम्बे समय तक उपेक्षा का सामना करना पड़ा। मजरूह सुल्तानपुरी और साहिर लुधियानवी जैसे शायरों को अपनी फिल्मी पहचान से अलग अदब की दुनिया में अपनी पहचान पाने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा। उस समय आज जैसे संचार माध्यम नहीं थे जो किसी को भी रातों-रात स्टार बना देते हैं। उस दौर में यदि नीरज ने खुद को जनता के बीचएक लोकप्रिय गीतकार व शायर के रूप में स्थापित कर लिया था तो इसमें बड़ी भूमिका कवि सम्मेलनों की थी जो कभी लोक संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करते थे। एक बार गणेश उत्सव के दौरान इंदौर में एक कवि सम्मेलन में नीरज को पहली बार सुना तो दंग रह गया। एक तरफ लोग उनसे लगातार फिल्मों में लिखे गीतों को सुनाने की फरमाइश कर रहे थे तो दूसरी तरफ वे लगातार अपनी गजलों से लोगों को बांधे हुए थे। उस दिन पहली बार उनका वास्तविक साहित्यकार वाला रूप देखा जो अधिक सार्थक और प्रभावी था। नीरज की तमाम गजलें और दोहे आमजन की व्यथा-कथा का बयान तो हैं हीं, साथ ही उनमें समय, समाज और राजनीति की आलोचना भी रही है। उसी मंच पर और उसके बाद कई बार अन्य कवि सम्मेलनों में नीरज ने अपने फिल्मी गानों के वास्तविक रूप को प्रस्तुत किया। दरअसल फिल्म निर्माण के दौरान बहुत बार कहानी और अन्य कारणों से गीत के बोल बदल दिये जाते हैं। पर जब नीरज मंच से वही गीत सुनाते थे तो मूल रूप में सुनाते थे फिर चाहे वह ‘स्वप्न झरे फूल से’ हो या ‘पूछो तो यारों हम कौन हैं, हम छुपे रूस्तम हैं’ हो।

नई उमर की नई फसल फिल्म का गीत ‘स्वप्न झरे फूल से’ की एक पंक्ति ‘कांरवा गुजर गया गुबार देखते रहे’ सिर्फ युवाओं की आवाज ही नहीं था बल्कि उसके सामाजिक व राजनीतिक निहितार्थ भी थे। उन दिनों युवाओं में जो आक्रोश और निराशा थी उसकी अभिव्यक्ति यह गीत करता था। यही कारण था कि लोग मंच से उनके मुख से इस गीत को सुनने की फरमाइश किया करते थे। गोपाल दास नीरज का जन्म 4 जनवरी 1925 को उत्तर प्रदेश के इटावा के निकट एक गांव में हुआ था। उनका शुरूआती जीवन बहुत कष्ट से गुजरा था। उन्हें दिल्ली सहित कई जगह नौकरी करनी पड़ी ताकि अपने परिवार के लिए दाल-रोटी का इंतजाम कर सकें। कुछ समय मेरठ में अध्यापन भी किया पर वे कहीं भी ज्यादा समय तक रूक नहीं सके। शायद इसलिए कि उनकी मंजिल कुछ सौ रूपये की नौकरी नहीं थी बल्कि उन्हें तो लोगों के दिलां में बसना था। गीत वह शुरू से ही लिखते थे और उनका पहला संग्रह ‘संघर्ष’ 1944 में प्रकाशित हुआ था। उन्होंने मंच पर गीत पढ़ना भी शुरू कर दिया था  परंतु जब गजल लिखने लगे तो उर्दू अदब में उन्हें स्वीकार नहीं किया गया। इसीलिए बाद में नीरज ने अपनी गजलों को गीतिका नाम दिया था। उन दिनों बहुत से कवि और शायर फिल्मों में गीत लेखन कर रहे थे जिनमें से मजरूह व साहिर बडे़ नाम थे। शैलेंद्र और आनन्द बख्शी का अपना मुकाम था। इन सबके बीच नीरज के लिए जगह बना पाना आसान नहीं था पर कहीं न कहीं उनका शायराना मिजाज ही उनके काम आया। अपने शुरूआती गीतों में ही उन्होंने यह प्रमाणिक कर दिया कि वह प्रेम और विरह के अद्भुत चितेरे तो हैं हीं, साथ ही उनके गीत अपने समय की धड़कन भी हैं, जैसा कि ‘नई उमर की नई फसल’ के ‘स्वप्न झरे फूल से’ गीत में देख सकते हैं। यह गीत फिल्म में आने से पहले ही मंच पर नीरज की पहचान बन चुका था। इसी प्रकार का एक और गीत था ‘काल का पहिया घूमे रे भइया’ फिल्म ‘चंदा और बिजली’ का है जो 1970 में बनी थी। नीरज का फिल्मी सफर साठ के दशक में शुरू हुआ जब आर. चंद्रा ने 1960 में एक फिल्म शुरू की थी ‘नई उमर की नई फसल’ जिसके लिए उन्होंने नीरज का गीत ‘कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे’ पसंद किया। यह गीत मोहम्मद रफी ने गाया था। यह फिल्म 1964 में प्रदर्शित हुई और नीरज का फिल्मी सफर शुरू हो गया।

नीरज तब तक मंचों पर अपनी रचनाओं के बल पर अपना स्थान बना चुके थे फिर भी वह सीमित था। फिल्मों ने उनकी लोकप्रियता को बढ़ाया जिसका फायदा मंच पर भी मिला। 1968 में आई शशी कपूर अभिनित ‘कन्यादान’ फिल्म में नीरज का लिखा गीत ‘लिखे जो खत तुझे वो तेरी याद में’ बहुत लोकप्रिय हुआ। इसके अलावा कई और फिल्मों में उन्होंने गीत लिखे जो बहुत पसंद किये गये। यह वह दौर था जब फिल्मी गीतों में काव्यात्मकता बची हुई थी। तब प्रत्येक गीत फिल्म की कहानी का एक हिस्सा होता था। 1970 का दशक नीरज के लिए सबसे अधिक कामयाबी का समय रहा। यही वह दशक था जब उन्होंने प्रेम पुजारी, शर्मिली, पहचान, मेरा नाम जोकर, गैम्बलर, तेरे मेरे सपने आदि फिल्मों के गीत लिखे। देव आनन्द की प्रेम पुजारी के गीत ‘फूलों के रंग से दिल की कलम से’ और ‘शोखियों में घोला जाए’ सहित सभी गानों की अपार लोकप्रियता के बाद तो देव साहब नीरज जी के मुरीद हो गये और बाद में अपनी कई फिल्मों के लिए उनसे गीत लिखवाए। 1971 में आयी मनोज कुमार की फिल्म ‘पहचान’ के लिए लिखे गीत ‘बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं, आदमी हूं आदमी से प्यार करता हूं’ के लिए उन्हें दूसरा फिल्म फेयर अवार्ड मिला और अगले ही साल ‘मेरा नाम जोकर’ के गीत ‘ए भाई जरा देख के चलो’ के लिए तीसरा फिल्म फेयर अवार्ड मिला। मेघा छाये आधी रात, खिलते हैं गुल यहां, दिल आज शायर है, चुड़ी नहीं है मेरा दिल है, मेरा मन तेरा प्यासा, जीवन की बगिया महकेगी जैसे गानों के कारण नीरज को हमेशा याद किया जाएगा।

फिल्मों के साथ ही बल्कि कहना चाहूंगा कि फिल्मों से भी अधिक उनका योगदान मंच पर रहा जहां उन्होंने गंभीर कविता को उस समय फिर से प्रतिष्ठित किया जब मंच पर हास्य कवियों का बोलबाला था। एक समय बच्चन जी के साथ काव्य पाठ कर चुके नीरज ने उस परम्परा को आगे बढ़ाये रखा। बच्चन जी तो वैसे भी नीरज के आदर्श थे और उनके काव्य संग्रह ‘निशा निमंत्रण’ को अपनी प्रेरक पुस्तक मानते थे। पर जब नीरज ने मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज करायी उस समय तक बच्चन जी और अन्य कवि एक तरह से मंच से दूर हो चुके थे। प्रगतिवाद और प्रयोगवाद  के बाद नयी कविता ने हिंदी साहित्य में गीत को बेमानी घोषित कर दिया था। ऐसे में नीरज जैसे कवियों ने न केवल गीत को जिंदा रखा बल्कि अपनी गजलों से उर्दू भाषियों तक सीमित इस विधा को हिंदी समाज में सम्मानित स्थान दिलाया। अपने फिल्मी योगदान के कारण नीरज को अमूमन प्रेम और विरह का कवि माना जाता था। इसमें संदेह नहीं कि उनके प्रेम व विरह गीत मन को छूने वाले थे पर उनके दूसरे गीत और खासतौर पर गजलें व दोहे उनका दूसरा ही रंग सामने लाते हैं। यह रंग है उस कवि का जो अपने समय और समाज के बारे में गंभीरता से सोचता है और लिखता भी है। ‘ अब तो मजहब कोई ऐसा चलाया जाए/जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए’ जैसी पंक्तियां उनके सामाजिक सरोकारों को सामने लाती हैं। इसी तरह एक अन्य शेर में वह कहते हैं ‘ये हिंदू है वो मुस्लिम है, ये सिख है वो ईसाई है/ सब के सब हैं ये-वो लेकिन कोई न हिंदुस्तानी है।’

नीरज की अपार ख्याति में फिल्मों के साथ ही उनकी गजलों ‘जब चले जाएंगे हम लौट के सावन की तरह/ याद आएंगे प्रथम प्यार के चुम्बन की तरह’ और ‘अब के सावन में शरारत ये मेरे साथ हुई/ मेरा घर छोड़ के कुल शहर में बरसात हुई’ का बहुत बड़ा योगदान है। बल्कि मुझे तो लगता है कि नीरज ऐसी ही रचनाओं के कारण नीरज हुए जिसका कुछ अंश उन्होंने फिल्मी गानों में भी डाला। उनके गीतों पर जहां लोक गीतों का भी असर रहा वहीं उन्होंने सामाजिक राजनीतिक व्यंग्य करते दोहे भी लिखे। ‘जिनको जाना था यहां पढ़ने को स्कूल/ जूतों पर पालिश करें वे भविष्य के फूल’ और ‘दूरभाष का देश में जब से हुआ प्रचार/ तब से घर आते नहीं चिट्ठी पत्री तार’ अलग-अलग यथार्थ को उजागर करते हैं। सत्तर के दशक के मध्य तक मंच पर उनकी पकड़ इतनी मजबूत हो चुकी थी कि उनका एकल काव्य पाठ ‘नीरज निशा’ के नाम से होने लगा था। इंदौर में इस तरह की कई ‘नीरज निशा’ में मैंने उन्हें रातभर सुना। यह उनकी ताकत थी कि वह बीच में कुछ विश्राम लेते हुए पूरी रात श्रोताओं को अपने जादू से बांधे रखते थे। और निश्चित ही इसका कारण उनकी रचनाओं में सिर्फ प्रेम और विरह का वर्णन न होकर जीवन के व्यापक अनुभव का समावेश था। इसी प्रकार का एक शेर जो बहुत मशहूर रहा है ‘कोई खुशी मेरे घर आती तो कैसे/ उम्र भर साथ रहा दर्द महाजन की तरह’ जैसे प्रत्येक आम आदमी की व्यथा का बखान बन जाता था।

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