किसे मिला जीएसटी का लाभ

बीबीसीखबर, संपादकीयUpdated 28-07-2018
किसे

डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज

एक साल का समय बहुत अधिक नहीं होता, किसी भी नयी योजना की सफलता के आंकलन के लिए परंतु जब नीतिगत फैसला बाजार की दैनिक गतिविधियों से संबंधित हो तो यह तो आशा की ही जा सकती है कि उसके कुछ तात्कालिक प्रभाव देखने को मिलें। हम बात कर रहे हैं एक साल पहले लागू जीएसटी यानी वस्तु एवं सेवा कर की। लम्बे समय से देश में एक ऐसी कर प्रणाली की मांग हो रही थी जिससे अलग-अलग राज्यों के कराधान से मुक्ति मिल सके। अलग-अलग कर होने के कारण वस्तुओं की कीमतों में तो अंतर आता ही था, साथ ही एक ही वस्तु पर कई तरह के कर लागू होने से उसकी कीमत बढ़ जाती थी। यदि पिछले एक साल को ही देखें जब से जीएसटी लागू हुआ है तो हम पाते हैं कि आम उपभोक्ता वस्तुओं की कीमत में लगातार वृद्धि देखी गयी है। सरकार का यह दावा हवाई साबित हो रहा है कि एक समान कर होने के कारण वस्तुओं व सेवाओं की कीमतों में कमी आएगी जिसका लाभ उपभोक्ताओं को मिलेगा। क्या  वास्तव में एक साल पहले और आज की स्थिति में कोई अंतर आया है? यह सवाल उस जनता की तरफ से है जो रोज कड़ी मेहनत करके किसी प्रकार अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम कर पाती है। विश्व बैंक या किसी और विदेशी संस्था की अनुसंधान रिपोर्ट में भले ही भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है और देश में अरबपतियों व करोड़पतियों की संख्या बढ़ी है परंतु इसके साथ आम जनता की आर्थिक परेशानियां भी बढ़ी हैं।

सरकार के तमाम दावों के बाद भी यदि महंगाई कम नहीं हो रही है और चीजों के दाम अनियंत्रित तरीके से बढ़ना जारी है तो यह सरकार को देखना ही होगा कि आखिर उसकी नीतियों और उनके क्रियान्वयन में कहां कमी है। यह बात इसलिए  महत्वपूर्ण है कि सरकार यह दावा करती रही है कि जीएसटी लागू होने के बाद देश में एक समान कर का लाभ उपभोक्ताओं को मिलेगा। यह लाभ किस प्रकार मिलेगा यह आज तक स्पष्ट नहीं हो पाया है।

जीएसटी लागू करने का एक साल पूरा होने पर सरकार की तरफ से इस बात का पूरा प्रयास किया जा रहा है कि जनता को एक बार फिर आंकड़ों की गुलाबी फसल से बहलाया जाए। यह सही है कि जीएसटी से लाभ हुआ है परंतु यह लाभ केवल उत्पादकों और व्यापारियों को मिलता नजर आता है। सरकार का यह दावा कि कर कम होने का लाभ जनता को मिलेगा कहीं हकीकत बनता नजर नहीं आता। और अब नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत 21 जुलाई को एक अखबार में छपे अपने लेख में यह दावा करते दिखाई देते हैं कि जीएसटी के असली विजेता उपभोक्ता ही हैं। इसके लिए वह एक तरफ कई वस्तुओं पर पहले लगने वाले अलग-अलग करों की तुलना में जीएसटी में कम कर दर होने का हवाला देते हैं। परंतु इससे वास्तव में उपभोक्ता वस्तुओं के दामों में कमी आयी हो इसका कोई प्रमाण वह नहीं दे सके। हां उन्होंने छोटी कारों की कीमतें कम होने की बात जरूर लिखी है पर कार भारत में कितने लोग खरीदते हैं। दूसरी बात यह कि कार निर्माताओं ने खुदरा कीमतों में कमी की ताकि उनकी बिक्री बढ़ सके। कार के अलावा और कौन सी ऐसी वस्तु है जो अनिवार्य आवश्यकता में शामिल है जिसकी कीमतें जीएसटी लागू होने के बाद कम हुई है? क्या किसी के पास इसका जवाब है। हां एक जवाब है कि पिछले एक महीने में गेहूं, तेल और दालों की कीमतें बढ़ी हैं। इसी तरह सब्जियों के दाम भी पहले की तुलना में बढ़े ही हैं भले ही किसी सप्ताह उनकी कीमत कम हुई हो परंतु औसतन देखें तो उसमें भी बढ़ोतरी नजर आती है। अमिताभ कांत का यह भी दावा है कि जीएसटी के कारण ही मुद्रास्फीती की दर छह प्रतिशत से नीचे ही रही है यानी कि कीमतें छह प्रतिशत से कम दर से बढ़ी हैं। यानी जीएसटी के साथ आपका यह दावा कि कीमतें कम होंगी सही नहीं है। यदि मुद्रास्फीती बढ़ी है तो उसका बोझ आम उपभोक्ताओं पर ही पड़ा है। फिर सरकार के जो भी आंकड़े हैं, विभिन्न वस्तुओं की कीमतों में उतार-चढ़ाव के वह सब थोक बाजार के हैं। खुदरा बाजार की स्थिति एकदम अलग है। एक व्यवहारिक स्थिति यह है कि किसी वस्तु की कीमत यदि थोक बाजार में बढ़ती है तो खुदरा बाजार में भी तत्काल बढ़ जाती है पर जब थोक बाजार में उसके दाम में कमी होती है तो खुदरा बाजार में कीमत कम नहीं होती और होती भी है तो कम मात्रा में। 

एक दिलचस्प विश्लेषण देखिये- एक अखबार में 20 जुलाई 2018 को खबर छपी है जिसमें बताया गया है कि पिछले एक सप्ताह में दालों के दाम बढ़े पर आलू व तेल में कमी आयी है। खबर में इन वस्तुओं के एक माह पहले के दाम भी दिये गये हैं परंतु इस बात को नजरअंदाज कर दिया गया है कि अधिकतर चीजों के दाम एक माह पहले की तुलना में बढ़े हैं। अरहर दाल एक माह पहले 49-51 रूपये थी जो आज 52-54 रूपये है। इसकी कीमत पिछले सप्ताह 51-53 थी। इसी प्रकार मसूर दाल 42.50-43.50 थी पिछले सप्ताह 42-44 थी और आज 48-49 है। चना दाल एक माह पहले 43-44 थी जो पिछले सप्ताह 45.50-46 और आज 54-54.50 है। गेहूं पिछले माह 17.42 था जो पिछले सप्ताह18.75 और आज 19.05 है। तेल पिछले माह 81.50 और पिछले सप्ताह 90 था जो आज 86.50 था। चीनी को देखें तो पिछले माह 32.40 और पिछले सप्ताह 33.50 थी और आज भी 33.50 है। इस अवधि में आलू व प्याज की कीमतों में कमी और टमाटर में वृद्धि हुई। सब्जियों की कीमतें उनकी आवक पर निर्भर करती है। 

ज्यादातर वस्तुओं की कीमतों को लेकर विश्लेषण का चलन हमारे यहां कम है। इस बात पर कोई गौर नहीं किया जाता कि जीएसटी लागू होने के बाद करों में कमी के बाद रेस्टारेंट से लेकर सड़कों के किनारे ठेले तक पर खाने की चीजें बेचने वालों के यहां कीमतों में कितना अंतर आया। इस बीच जाहिर है कि उनकी कीमतें यदि बढ़ी नहीं हैं, खासतौर पर छोटी दुकानों पर, तो कम भी नहीं हुई हैं। इसके अलावा रेस्टारेंटों में तो खानपान की चीजों के दाम बढ़े ही हैं जबकि यह आशा की गयी थी कि उनमें कमी आएगी। इसके साथ ही ब्रांडेड कपड़ों, आम जनता के उपयोग के आम इलेक्ट्रॉनिक सामान, जूते, टूथपेस्ट, साबुन सहित तमाम चीजों की कीमतें कम होने की जगह बढ़ी ही हैं और यदि बढ़ी नहीं हैं तो कम भी नहीं हुई हैं। ऐसे  में यह दावा करना कि जीएसटी के असली विजेता उपभोक्ता ही हैं हास्यास्पद लगता है। हो सकता है कि सरकार अपनी आंकड़ेबाजी से इसे प्रमाणित करने में सफल हो जाए परंतु भूखे लोगों को आप आंकड़ों से नहीं बहला सकते। दिल्ली से मेरठ एक्सप्रेस-वे बनाकर  आप उन लोगों को खुश कर सकते हैं जो अपना समय बचाना चाहते हैं पर उन लोगों का क्या जो दिल्ली में ही एक जगह से दूसरी जगह जाने में अपने जीवन का महत्वपूर्ण समय बिता देते हैं। उनके लिए समय से अधिक महत्वपूर्ण है उन वस्तुओं की कीमतें जो उनके जिंदा रहने के लिए जरूरी हैं। यदि उनकी थाली छोटी होती जाएगी या खाली होती जाएगी तो उन्हें न कोई एक्सप्रेस-वे खुश कर सकता है और न ही कोई और बात।  

24 जुलाई को एक खबर आयी कि जीएसटी की दरों में कटौती के बाद भी कंपनियों ने दाम करने से इनकार कर दिया है। इससे पहले भी जीएसटी में जिन वस्तुओं पर कर कम किया गया था उनका उपभोक्ताओं को कोई लाभ नहीं मिल पाया। खबर के अनुसार सरकार ने जीएसटी पर फ्रिज, एसी, टीवी, वॉशिंग मशीन आदि पर दस प्रतिशत तक की कर कटौती की है पर कंपनियां इसका लाभ उपभोक्ताओं को देने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि वे पहले ही बढ़ी हुई लागत का भार उठा रही हैं जिसका बोझ उन्होंने उपभोक्ताओं पर नहीं डाला। इससे उनका मुनाफा कम हो गया है। पेंट हो या इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद कर में कटौती से मांग बढ़ने और लागत घटने का तो स्वागत किया है पर दाम कम करने से मना कर दिया है जबकि विŸा मंत्री पीयूष गोयल ने कहा था कि इसका कर कटौती का उद्देश्य ग्राहकों को कम दाम पर चीजें उपलब्ध कराना है। उन्होंने सेनेटरी नैपकिन निर्माताओं पर नजर भी रखने को कहा है क्योंकि सरकार ने इसपर अभी तक लागू 12 प्रतिशत कर पूरी तरह समाप्त कर दिया है। 

इस खबर में इस बात का भी उल्लेख है कि पेंट कंपनियों ने इसी साल 5 से 10 प्रतिशत दाम बढ़ाए थे। गोदरेज और व्हर्सपुल जैसी कंपनियों ने जून में ही अपने उत्पादों के दाम 5 प्रतिशत बढ़ाए हैं। लोहिया ऑटो के सीईओ आयुष लोहिया का कहना है कि लीथियम बैटरी पर टैक्स घटने से इलेक्ट्रॉनिक वाहनों की मांग तेजी से बढे़गी। हम इसका लाभ आगे चल कर उपभोक्ताओं को देने का पूरा प्रयास करेंगे। यानी कि कुल मिलाकर देखा जाए तो सरकार का कर कटौती से जो कीमतों में कमी आने का दावा था वह पूरा नहीं हो पाएगा। इसका लाभ केवल कंपनियों को मिलेगा। ऐसे में यदि यह कहा जा रहा है कि करों में कमी केवल कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए की गयी है तो कुछ गलत नहीं लगता। इस कर कटौती से सरकार को 15 हजार करोड का बोझ पडे़गा। जाहिर है कि इसकी भरपाई किसी और तरीके से की जाएगी। कर कटौती  के बाद खपत बढ़ने से होने वाली राजस्व बढ़ोतरी सपना ही रहेगी। अब  सरकार यदि इस  घाटे को पूरा करने के लिए अप्रत्यक्ष  करों का सहारा ले तो कोई  आश्चर्य नहीं होगा। 

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