गैर ब्राह्मण पुजारीः एक नयी शुरूआत

बीबीसीखबर, संपादकीयUpdated 31-08-2018
गैर

 डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज

ज्यादातर अखबारों व अन्य मीडिया ने इस खबर को बहुत महत्व नहीं दिया कि तमिलनाडु में पहली बार एक गैर ब्राह्मण को एक मंदिर में पुजारी नियुक्त किया गया है। यह नियुक्ति एक सरकारी संस्थान के माध्यम से हुई है। मीडिया के लिए अब इस तरह की खबरें विशेष आकर्षण नहीं रखती, किसी भी तरह की सकारात्मक और परिवर्तनकारी खबरें आकर्षण नहीं रखतीं। पर यह खबर अपने आप में एक बड़ी खबर है, उस परिवर्तन का आगाज है जिसकी राह भारतीय समाज देखता रहा है। हाल के वर्षों में जिस तरह से देश के विभिन्न क्षेत्रों में दलितों के साथ हिंसा हुई है उसे देखते हुए यह खबर एक नयी सुबह की शुरूआत कही जा सकती है बशर्ते देश के बाकी राज्यों में भी सरकारें तमिलनाडु सरकार से प्रेरणा लेकर पहल करें। यदि ऐसा होता है तो भारतीय समाज के एकीकरण की प्रक्रिया को बल मिलेगा। हालांकि ऐसा करना राजनीतिक दलों के लिए फायदेमंद नहीं होगा क्योंकि किसी भी तरह से लोगों के बीच समानता कायम होने का अर्थ है कि उनके लिए विभाजन की राजनीति कर अपनी स्थिति मजबूत करना संभव नहीं रह जाएगा। 
अभी गत 30 जुलाई को ही अखबार में एक खबर पढ़ी थी कि गुजरात के बोटाड जिले के एक गांव में दलित महिलाओं को शिव मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया। हालांकि पुलिस ने मामले में हस्तक्षेप करते हुए दावा किया कि नये बन रहे मंदिर में किसी भी जाति की महिला के लिए प्रवेश पर पाबंदी रखी गयी है। यदि ऐसा है तो यह और बड़ा अपराध है। यह तो कुछ इस तरह हुआ कि आप शिव की पूजा कर सकते हैं पर साथ में पार्वती की नहीं। यदि पार्वती के बिना शिव अधूरे हैं
तो फिर शिव की पूजा से स्त्रियों को रोकना क्या पार्वती का अपमान नहीं है। फिर यह केवल एक मंदिर का मामला नहीं है।
कुछ साल पहले ऐसी ही एक अजीब घटना ओडिशा से सामने आयी थी जहां दलित कांवडियों को शिवरात्रि के दिन मंदिर में शिवजी का जलाभिषेक करने से रोकने के लिए मंदिर में ही घुसने नहीं दिया गया।
यानी जो व्यक्ति गंगाजल ला सकता है वह उसे शिवजी पर चढ़ा नहीं सकता, यह कैसा धार्मिक विधान है।
पिछले दिनों एक दलित को शादी में घोड़ी पर चढ़कर बारात निकालने के लिए न्यायालय की मदद लेनी पड़ी। ऐसी घटनाएं भी सामने आती रही हैं जिसमें किसी दलित युवक को शादी में घोड़ी पर बैठने पर अपमानित किया गया, मारा-पीटा गया। यह और इस तरह की अन्य खबरें राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र सहित देश के सभी क्षेत्रों से सामने आती रही हैं। 
तमिलनाडु में किसी गैर ब्राह्मण को मंदिर का पुजारी बनाया जाना उक्त घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण है। एक तो यह कि इसकी पहल शासन के स्तर पर की गयी थी। 2006 में करूणानिधि सरकार ने एक आदेश जारी कर कहा था कि मंदिरों में सभी समुदायों के लोगों को पुजारी बनाया जा सकता है। 2007 में दलित व पिछड़े वर्ग के 24 लोगों सहित कुल 206 लोगों को पुजारी का प्रशिक्षण लेने के लिए भेजा गया जिन्हें अब जूनियर पुजारी का प्रमाणपत्र मिला है। इस मामले में कुछ लोगों ने सरकार के निर्णय को अदालत में चुनौति दी थी पर सर्वोच्च न्यायालय ने 2015 में सरकार के निर्णय को वैध करार देने के बाद नियुक्ति का रास्ता खुल पाया। इसके विरोध में यह कहा जा सकता है कि इस तरह दलितों को सवर्ण बनाने की कोशिश की जा रही है। यह भी हो सकता है कि कोई दलित नेता मंदिरों में पुजारियों की नियुक्ति में आरक्षण की मांग करने लगे। क्योंकि ऐसा करने से सवर्णां और दलितों के बीच का विभाजन और मजबूत हो जाएगा जो खुद दलित नेताओं की राजनीति के लिए खाद-पानी का काम करता है। 
इस खबर का जो सबसे अधिक सकारात्मक पहलू है वह यह कि तमिलनाडु सरकार की इस पहल में दलितों के प्रति कोई दयाभाव न होकर, उन्हें कुछ अनुकंपा देने का भाव न होकर उन्हें अन्य वर्गां के समान सक्षम बनाना है। सरकार ने दलितों या अन्य लोगों को पहले इस योग्य बनाया गया है कि वे मंदिरों में एक पुजारी के रूप में काम करने में समर्थ हों।
हमारे यहां आरक्षण के माध्यम से दलितों व अन्य वर्ग के लोगों को लगातार शैक्षिक और सामाजिक रूप से कमजोर करने का ही काम किया गया है। सरकार ने उन्हें प्रतियोगी बनाने और अपने बल पर वह सब कुछ हासिल करने के लिए, जो दूसरे वर्गों को प्राप्त है, योग्य बनाने पर कभी ध्यान नहीं दिया। कहने को शैक्षणिक सुविधाएं दी गयीं पर साथ ही बिना पढ़े भी पास होने और न्यूनतम योग्यता का पैमाना बहुत नीचा रखकर उन्हें ताकतवन बनने की बजाय कमजोर बने रहने का आधार दे दिया गया। तमिलनाडु सरकार का निर्णय एक नयी सुबह की शुरुआत हो सकता है यदि इसे देश के बाकि हिस्सों में भी लागू कर दिया जाए। 
मंदिरों में प्रवेश को लेकर मैंने फेसबुक पर लिखा कि दलितों को अपने मन को मंदिर मानना चाहिए और खुद को आर्थिक व शैक्षिक रूप से इनता समृद्ध बनाना चाहिए कि कोई उनको रोकने की हिम्मत न करे। यह बात कुछ लोगों को पसंद नहीं आयी। व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि दलितों में मंदिर में जाकर पूजा करने की जिद कहीं न कहीं उन्हें कमजोर साबित करती है। जब हम यह मानते हैं, सारे धर्मशास्त्र भी कहते हैं कि भगवान हर कहीं है, हर इंसान में है तो दलित क्यों मंदिरों में जाने के हक की मांग करके खुद को कमजोर साबित करना चाहते हैं। क्या मन्दिर में जाने का मौका मिलने से वे सामाजिक भेदभाव से मुक्त हो जाएंगे? क्या ऐसा करने से उनके सामाजिक के साथ ही आर्थिक व राजनीतिक विकास हो जाएगा? क्या वह लोग उन्हें इंसान मान लेंगे जो अभी तक उनके साथ जानवरों से भी ख़राब व्यवहार करते रहे हैं। और यदि यह सब नहीं होना है तो फिर किसी ऐसे मन्दिर में प्रवेश करने का क्या लाभ जहाँ उनके जाने पर आपत्ति हो। देश में मन्दिरों की कमी नहीं है और उनमें ऐसे मन्दिर ज्यादा हैं जहाँ प्रवेश करने वालों से जाति प्रमाण पत्र नहीं माँगा जाता। मन्दिर जाने में ही यदि मुक्ति है तो उन मन्दिरों में चले जाइये। नहीं तो अपने मन में मन्दिर बनाइये, खुद को शिक्षा और आर्थिक आधार पर इतना मजबूत बनाइये कि आपको खुद को दलित कहना ही न पड़े।
जब तक लोग जन्म के आधार पर खुद को कमजोर मानते रहेंगे तब तक धर्म के ठेकेदारों की मनमानी को ख़त्म नहीं किया जा सकता। भगवान सिर्फ मन्दिर में नहीं रहता। उसे मनाना है, पूजना है तो कहीं भी ऐसा किया जा सकता है, बस मन में श्रद्धा होनी चाहिए। आप ऐसे मन्दिरों में जाने की जिद करते हैं जहाँ आपको जाने नहीं दिया जा रहा तो एक तरह से आप उनकी महानता को स्वीकार करते हैं। दलितों में और अन्य पिछड़ों में ऐसे लोगों की संख्या अधिक है जो अपने ही समाज में आर्थिक व शैक्षिक रूप से पीछे होने के कारण अन्याय के शिकार हैं। यहाँ तक कि दलितों के नेता भी उन्हें आगे आने देना नहीं चाहते। ऐसे में एक ही तरीका है अपने समाज और दूसरे समाजों को सबक सिखाने का कि खुद को शैक्षिक व आर्थिक रूप से मजबूत किया जाए। जो पण्डित व पुजारी किसी को जाति के आधार पर मन्दिर में आने व पूजा से रोकता है वह ईश्वर का निरादर करता है। ऐसे निरीह लोगों के बारे में सोचने से भी क्या फायदा जो किसी की जाति से डरते हों,  उसकी छाया पड़ने से भी अपवित्र हो जाते हों। ऐसे लोग नफरत के नहीं दया के पात्र होते हैं। रामायण यदि हमारा मर्यादा ग्रन्थ है तो उसमें यही सिखाया गया है कि व्यक्ति कर्म और मानव-प्रेम से बड़ा होता है।
शबरी, केवट, सुग्रीव, हनुमान, जटायू आदि अपने कर्म और व्यवहार के कारण ही श्रेष्ठजन बने थे, जन्म या अपनी जाति के कारण नहीं।

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