कौमी एकता जरूरी

बीबीसीखबर, धर्मUpdated 11-08-2018
कौमी

गणेश मिश्रा बीबीसी खबर ।

मेरा विश्वास अटल है कि कौमी एकता के बगैर अहिंसा के जरिये तो स्वराज नहीं मिल सकता है। जातियां एक-दूसरे के साथ इन्साफ न करें तो एकता भी नहीं हो सकती है। मुसलमानों से या और किसी से भी दोस्ती रिश्वत देकर नहीं की जा सकती है। रिश्वत देना तो खुद कायरता होगी और इस कारण उसमें हिंसा भी रहेगी। पर मैं अपने भाई को उसके हिस्से से ज्यादा देता हूं, तो न यह उसे रिश्वत देना हुआ और न किसी और के साथ अन्याय। उदार होने से ही सन्देह दूर किया जा सकता है। उदारता के बिना न्याय सहज ही शायलाक (कर्ज के बदले कर्जदार का मांस लेनेवाला) का सा न्याय हो सकता है।

 

 मुझे जिस काम के खातिर यह उदारता दिखानी है वह काम ही न बिगड़ जाये। इस कारण न मैं एकता का विचार छोड़ सकता हूं और न उसका प्रयत्न।... मगर काइदे आजम जिन्ना साहब का मेरे जवाब में जो बयान छपा है उससे मुसलमानों के विचार ठीक-ठीक प्रगट होते हों तो एकता की सारी आशाएं चूर-चूर हो जाती है उन्होने हिन्दुस्तान का ऐसा चित्र खींचा है कि यह एक महाव्दीप है, जिसमें अपने-अपने धर्मों के अनुसार कई राष्ट्र हैं। यह चित्र सच्चा हो जाये तो काग्रेंस के पचास साल से भी अधिक किये-कराये पर पानी फिर जाये ।               

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