आरक्षण का झुनझुना

बीबीसीखबर, संपादकीयUpdated 19-08-2018
आरक्षण

डॉ. वेद प्रकाश भारव्दाज ,वरिष्ठ पत्रकार

वर्तमान भारत में राजनीति से लेकर समाज तक जो सबसे चर्चित मसला है वह आरक्षण का है। आरक्षण के सवाल को आज तक कोई सरकार सुलझा नहीं पायी, हां वे उसे और उलझाने में सफल जरूर रहीं।

देश में लागू आरक्षण व्यवस्था की असली तस्वीर देखने के लिए एक ताजा खबर पर नजर डालते हैं। आज यानी 19 अगस्त को अखबारों में यह खबर आई है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के विशेष अभियान चलाने के बाद भी विभिन्न कॉलेजों में आठवीं कटऑफ लिस्ट जारी होने के बाद भी आरक्षित सीटें खली रह गयी हैं। इस खबर ने मुझे 1990 की एक खबर याद दिला दी। उन दिनों केंद्र की वीपी सिंह सरकार ने मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करते हुए अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था लागू करने के बाद चारों तरफ आरक्षण विरोधी आंदोलन हो रहे थे। इसके लिए उन्हें कई तरह की सुविधाएं दी गयीं जिनमें छात्रवृत्ति, फीस माफी, मुफ्त पुस्तकें आदि तो शामिल हैं हीं, उन्हें प्रवेश में भी आरक्षण दिया गया।

यही स्थिति कमोबेश सरकारी नौकरियों में है। कितने ही विभाग हैं जहां सैकड़ों आरक्षित पद रिक्त हैं और कई सालों से हैं। इसी वर्ष केंद्र सरकार ने संसद को यह जानकारी दी थी कि विभिन्न मंत्रालयों और अन्य सरकारी उपक्रमों में करीब पांच लाख पद खाली पड़े हैं ,जिनमें आरक्षित पद भी शामिल हैं। सरकार ने उनमें से आधे यानी करीब ढाई लाख पद समाप्त करने का निर्णय लिया है।

हकीकत यह है कि वह पद इसलिए खाली नहीं रह गए है कि उनके लिए लोग मिले नहीं बल्कि खर्चों में कटौती की नीति के कारण भी उन पदों को भरने में कोई रूचि नहीं ली गई और यह सब बड़ी खामोशी से होता रहा और सालों से होता रहा जिसमें पिछली सरकारें भी भागीदार रही हैं

इस देश में करीब 12 करोड़ लोगों के बेरोजगार होने का अनुमान है जिनमें से करीब 5 करोड़ युवा हैं। इसमें अर्द्ध-बेरोजगार व मौसमी बेरोजगार भी शामिल हैं। उनमें से ज्यादातर लोग सरकारी और निजी दोनों नौकरियों में आमतौर पर निचले पायदान की नौकरियों पर होते हैं।

आज जब सरकारी नौकरियां हैं नहीं, निजी क्षेत्र में नौकरियां हैं पर वहां किसी तरह की सुरक्षा नहीं है तब आरक्षण का झुनझुनां लोगों को कब तक और कितना बहला सकेगा।

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