आरक्षण का झुनझुना

बीबीसीखबर, संपादकीयUpdated 19-08-2018
आरक्षण

डॉ. वेद प्रकाश भारव्दाज ,वरिष्ठ पत्रकार

वर्तमान भारत में राजनीति से लेकर समाज तक जो सबसे चर्चित मसला है वह आरक्षण का है। आरक्षण के सवाल को आज तक कोई सरकार सुलझा नहीं पायी, हां वे उसे और उलझाने में सफल जरूर रहीं।

पिछले दिनों एक तरफ जाटों ने आरक्षण को लेकर फिर से आंदोलन की तैयारी शुरू कर दी व कुछ जगहों पर अपनी शक्ति का प्रदर्शन भी किया तो दूसरी तरफ केंद्र ने पदोन्नति में भी आरक्षण पर मोहर लगा दी। यानी एक बार फिर सरकार ने आरक्षण का झुनझुना थमा कर आगामी लोकसभा चुनाव में खुद की स्थिति को मजबूत करने की पहल की है। आरक्षण का मसला वास्तव में राजनीतिक दलों के लिए दलितों और पिछड़ों को इंसान से वोट में बदलने और उसे अपने पक्ष में करने का सिद्ध-मंत्र मान लिया गया है। इससे दलितों-पिछड़ों को भले ही मानसिक संतोष मिला हो पर हकीकत यह है कि आज भी दलितों व पिछड़ों में ऐसे लोग करोड़ों की संख्या में हैं जो सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से आजादी के पहले वाली स्थिति से बहुत आगे नहीं बढ़ पाए हैं।

आरक्षण का झुनझुना बजता तो अच्छा है पर उसका परिणाम क्या निकलता है यह किसी से छिपा नहीं है। जो सवर्ण आरक्षण के विरोध में खड़े होते हैं उन्हें भी पता नहीं होता कि उनका विरोध कितना निरर्थक है। जब सरकारी नौकरियां हैं ही नहीं तो फिर क्या फर्क पड़ता है कि किसको कितना आरक्षण दिया गया है। 

देश में लागू आरक्षण व्यवस्था की असली तस्वीर देखने के लिए एक ताजा खबर पर नजर डालते हैं। आज यानी 19 अगस्त को अखबारों में यह खबर आई है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के विशेष अभियान चलाने के बाद भी विभिन्न कॉलेजों में आठवीं कटऑफ लिस्ट जारी होने के बाद भी आरक्षित सीटें खली रह गयी हैं।

 

इस खबर ने मुझे 1990 की एक खबर याद दिला दी। उन दिनों केंद्र की वीपी सिंह सरकार ने मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करते हुए अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था लागू करने के बाद चारों तरफ आरक्षण विरोधी आंदोलन हो रहे थे। दिल्ली में एक युवक की आत्महत्या से माहौल में तनाव था। उन्हीं दिनों खबर छपी कि दिल्ली में एमबीबीएस की एक आरक्षित सीट खाली ही रह गयी क्योंकि उस पर एक पूरी तरफ फेल अभ्यार्थी, जिसे कुछ पेपरों में शून्य नंबर मिले थे, भर्ती के लिए बुलाए जाने के बाद भी नहीं आया। आज 28 साल बाद भी हालात जस के तस हैं। यहीं आकर आरक्षण की सार्थकता और हमारे नीति निर्माताओं की मंशा संदिग्ध हो जाती है। और यह भी लगने लगा है कि सरकार चाहे किसी भी राजनीतिक दल की हो, दलितो, पिछड़ों और आदिवासियों के विकास के उनके दावे वस्तुतः एक छलावा है।

जब देश में दलितों-पिछड़ों को शिक्षा के समुचित अवसर उपलब्ध करा कर उनका विकास करने की योजना को लागू किया गया था तब यह उम्मीद की गयी थी कि इससे उनका सामाजिक स्तर बढ़ेगा। इसके लिए उन्हें कई तरह की सुविधाएं दी गयीं जिनमें छात्रवृत्ति, फीस माफी, मुफ्त पुस्तकें आदि तो शामिल हैं हीं, उन्हें प्रवेश में भी आरक्षण दिया गया। इसके निश्चित ही सकारात्मक परिणाम मिले हैं और हम पाते हैं कि विभिन्न क्षेत्रों में उन्होंने काफी हद तक खुद को प्रतियोगी बनाने की क्षमता अर्जित की है। परंतु दुर्भाग्य यह है कि इस क्षमता का विकास समुचित मात्रा और दिशा में नहीं हो पाया। उन्हें तरह-तरह के आरक्षण के माध्यम से लगाता इस बात को मजबूत किया गया है कि वह अन्य लोगों की तुलना में आज भी कमजोर हैं और बिना सरकारी अनुकंपा के वे दूसरों के साथ खड़े होने के लायक नहीं हैं। यानी एक तरह से लगातार बैसाखियों के सहारे खड़ा होने की मानसिकता उनमें स्थापित की जाती रही है। शायद इसी का नतीजा है कि कॉलेजों में सीटें आरक्षित होने और विशेष अभियान चलाने के बाद भी वे खाली रह जाती हैं।

यही स्थिति कमोबेश सरकारी नौकरियों में है। कितने ही विभाग हैं जहां सैकड़ों आरक्षित पद रिक्त हैं और कई सालों से हैं। कारण कि उनके लिए आरक्षित वर्गों में न्यूनतम योग्यता पूरी करने वाले प्रत्याशी नहीं मिल पाए या फिर किसी अन्य कारण से उन्हें भरा नहीं जा सका। इसी वर्ष केंद्र सरकार ने संसद को यह जानकारी दी थी कि विभिन्न मंत्रालयों और अन्य सरकारी उपक्रमों में करीब पांच लाख पद खाली पड़े हैं ,जिनमें आरक्षित पद भी शामिल हैं। सरकार ने उनमें से आधे यानी करीब ढाई लाख पद समाप्त करने का निर्णय लिया है। एक तरफ लोगों की यह शिकायत रहती है कि उन्हें सरकारी नौकरियां मिल नहीं पा रही हैं और दूसरी तरफ लाखों पद खाली हैं। हकीकत यह है कि वह पद इसलिए खाली नहीं रह गए है कि उनके लिए लोग मिले नहीं बल्कि खर्चों में कटौती की नीति के कारण भी उन पदों को भरने में कोई रूचि नहीं ली गई और यह सब बड़ी खामोशी से होता रहा और सालों से होता रहा जिसमें पिछली सरकारें भी भागीदार रही हैं। यही कारण है कि किसी भी राजनीतिक दल ने इस मुद्दे को उठाना जरूरी नहीं समझा। शायद इसलिए कि सरकारी पदों के खाली रहने या उन्हें भरने का मामला समुदाय विशेष को वोट में बदलने की ताकत नहीं रखता। फिर यह भी कि कुछ हजार या लाख नौकरियां करोड़ों दलितों-पिछड़ों को वह संतुष्टि नहीं दे पाएगीं, जो आरक्षण लागू रहने या उसमें वृद्धि से मिलेगी और इसी से दलित-पिछड़े व अन्य वर्ग जो आरक्षण मांग रहे हैं मतदाताओं की भीड़ में बदल जाएंगे जो राजनीतिक दलों का लक्ष्य भी है।

इस देश में करीब 12 करोड़ लोगों के बेरोजगार होने का अनुमान है जिनमें से करीब 5 करोड़ युवा हैं। इसमें अर्द्ध-बेरोजगार व मौसमी बेरोजगार भी शामिल हैं। इन बेरोजगारों में बड़ी संख्या समाज के वंचित वर्गों की है। दलितों व  पिछड़ों में लोग ऐसे रोजगार या स्व-रोजगार में हैं,जिनके कारण उनके सामाजिक व आर्थिक स्तर में बहुत बदलाव नहीं आता। उनमें से ज्यादातर लोग सरकारी और निजी दोनों नौकरियों में आमतौर पर निचले पायदान की नौकरियों पर होते हैं। इसीलिए उन्हें मिलने वाली सरकारी सुविधाओं और आरक्षण का उन्हें और समाज को बहुत लाभ नहीं मिल पाता। विभिन्न सरकारों ने वंचित वर्गों के विकास के लिए कई तरह की स्व-रोजगार योजनाओं को समय-समय पर लागू किया है। ग्रामीण क्षेत्रों में इस तरह की तमाम योजनाएं लागू रही हैं। पर क्या आप जानते हैं कि उन योजनाओं की सबसे बड़ी विड़म्बना क्या रही है। एक समय मैं एक सामान्य बीमा कंपनी में विकास अधिकारी था। उन दिनों ग्रामीण क्षेत्र में मैंने पाया कि स्व-रोजगार के लिए बैंकों से दलितों-पिछड़ों को जो कर्ज दिया जाता था, उसमें आमतौर पर उन्हें सब्जी की दुकान लगाने या ऐसे ही अन्य कामों के लिए दिया जाता था। यहां हम इस बात की चर्चा नहीं करेंगे कि उसमें मिलने वाली सब्सिडी की क्या भूमिका थी और लोग कर्ज लेकर वास्तव में अपना काम करते थे या नहीं। हम इस बात पर गौर करें कि उन्हें किस काम के लिए कर्ज दिया जाता था। सब्जी बेचने, मोटर वाईंडिंग, लकड़ी का फर्निचर बनाने और ऐसे ही कामों के लिए कर्ज लेने को बाध्य किया जाता था। यह सब वह काम हैं जो समाज का कथित उच्च वर्ग नहीं करता है। यह काम तो शुरू से ही दलित व पिछड़े वर्ग के लोग करते ही आये हैं। यदि इन कामों से उनका उत्थान हो सकता तो पहले ही हो चुका होता। यही स्थिति आरक्षण को लेकर है। दरअसल आरक्षण तभी कारगर हो सकता है जब वह व्यक्ति को सक्षम बनाए, अनुकंपा का पात्र नहीं। यह विडंबना ही है कि देश में अब तक की सभी सरकारें और राजनीतिक दल दलितों-पिछड़ों में इस बात को मजबूत करते रहे हैं कि उनके लिए योग्य बनना जरूरी नहीं है, सरकार उन्हें वैसे ही सब कुछ दे देगी। और हकीकत में सरकार कुछ देती नहीं है क्योंकि उसके पास देने को कुछ है ही नहीं।

कुछ हजार नौकरियां, मुफ्त शिक्षा, आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र देकर सरकारों ने करोड़ों लोगों में यह भ्रम फैलाने में सफलता अर्जित की है कि सरकार उनके विकास को प्राथमिकता देती है। पर आज जब सरकारी नौकरियां हैं नहीं, निजी क्षेत्र में नौकरियां हैं पर वहां किसी तरह की सुरक्षा नहीं है तब आरक्षण का झुनझुनां लोगों को कब तक और कितना बहला सकेगा।

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