आसमान में कूड़ा घर

बीबीसीखबर, संपादकीयUpdated 20-08-2018
आसमान

 दिव्यांका शुक्ला , बीबीसी खबर 

इसे अक्सर विकास का पदचिन्ह भी कहा जाता है । जहां -जहां इंसान के चरण पड़े हैं।  वहां-वहां कुड़ा पहुंचा है ।  पूरे मानव विकास के क्रम में कूड़ा लगातार बढ़ा है और उसका रूप भी बदला है।  शहरों और खासकर महानगरों के लिए कूड़ा और उसका निपटान भीषण समस्या बन चुका है । फिर प्लास्टिक की समस्या है ,ऐसा कूड़ा जो कभी नष्ट नहीं होता इसे लेकर नदी-नालों तक में समस्या पैदा हो रही हैं ।इससे  समुद्र भी अछूता नहीं रहा । डर है कि कहीं प्लास्टिक का समुद्र किसी  महासागर से भी बड़ा हो जाए । यह समस्या सिर्फ समुद्र की गहराई तक ही नहीं पहुंची बल्कि पहाड़ो की उचाई तक भी  पहुंच चुकी है ।
ट्रैकिंग के लिए जो पर्वतारोही पहाड़ों पर चढ़ते हैं ,वो  वहां पर कई तरह का कूड़ा छोड़ आते हैं इसलिए एवरेस्ट को अब सबसे ऊंचा पर्वत ही नहीं सबसे ऊंचा कूड़ाघर भी कहा जाने लगा है । इसे नियंत्रित करने के लिए कई तरीके अपनाए जा रहे हैं । नेपाल सरकार ऊपर जाने वाले सभी पर्वतारोहियों के सामान की सूची बनाती है फिर वापस में यह देखा जाता है कि प्लास्टिक की थैलियां , एलुमिनियम के कैन , सिगरेट की डिब्बियां , वगैरह सब वापस आया कि नहीं ?सब नहीं आया तो जुर्माना लगता है । हॉलाकि समस्या इससे भी हल नहीं हो रही लेकिन इन दिनों जिस कूड़े को लेकर वैज्ञानिक सबसे ज्यादा परेशान होता है । अंतरिक्ष में लगातार बढ़ रहा कूड़ा, जिसे स्पेस जंक कहा जाता है । यह जंक दो तरह का होता है । एक तो तरह तरह की उल्काएं जो प्राकृतिक कूड़ा है , दूसरे वह कूड़ा जो हमने अंतरिक्ष को दिया है यानी छोटे-बड़े तरह-तरह के रॉकेट समय-समय पर भेजे गए अंतरिक्ष यान वे उपग्रह जिनकी मियाद खत्म हो चुकी है  ।
टूटे हुए उपग्रहों के निकले टुकड़े और कलपुर्जे कुछ समय पहले चीन ने अंतरिक्ष में दो ग्रहों की टक्कर का एक प्रयोग किया था जिससे दोनों चकनाचूर हो गए । धातु के ना जाने ऐसे  कितने टुकड़े पृथ्वी की कक्षाओं में घूम रहे हैं । प्राकृतिक और मानव जनित कूड़े में एक आधारभूत फर्क है । उल्काएं आमतौर पर सूर्य की कक्षाओं  में चक्कर लगाती हैं, लेकिन मानव जनित कूड़ा पृथ्वी की कक्षाओं  में चक्कर लगाता है इसलिए इसका पथ से भटक जाना,  किसी उपग्रह अंतरिक्ष यात्री से टकरा जाना ज्यादा घातक हो सकता है । कूड़े की गति 17500 मील प्रति  होती है  घंटा यानी बंदूक से निकलने वाली गोली का 22 गुना ज्यादा ।
प्राकृतिक उल्काएं जब धरती के वायुमंडल के टकराती हैं ,तो घर्षण के चकनाचूर हो जाती हैं । जबकि मानवजनित उल्काएं ऐसी मिश्रित धातुओं  से बनती है जो ऐसे घर्षण को लंबे समय तक बर्दाश्त कर सकें ।अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का अनुमान है कि ऐसे कूड़े के 5 लाख से ज्यादा टुकड़े पृथ्वी की कक्षाओं में घूम रहे हैं और कोई नहीं जानता कि उनके कैसे मुक्ति पाए जाए । इसलिए अब जरूरी हो गया है कि हर अंतरिक्ष अभियान के दौरान इस पहलू पर जरूरी विचार किया जाए - जैसे दवाओं वगैरह के परीक्षण के लिए एथिक्स कमेटी बनाने का प्रावधान है । वैसा ही प्रोटोकॉल इस मामले में भी बने या जैसा हमारे यहां ग्रीन ट्रिब्यूनल  है वैसा ही कुछ अंतरिक्ष के लिए विश्व स्तर पर बने । अभी तक हम यह मानते थे कि अगर धरती सुरक्षित नहीं रही तो हम भी सुरक्षित नहीं रहेंगे अब हमें अंतरिक्ष की सुरक्षा पर भी सोचना होगा ।

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