इमरान से सबको कितनी उम्मीद

बीबीसीखबर, संपादकीयUpdated 21-08-2018
इमरान

 दिव्यांका शुक्ला ,बीबीसी खबर 

इमरान खान के पाकिस्तान के 22वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने के साथ ही आम चुनाव के बाद लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता हस्तांतरण का काम पूरा हो गया है।  मगर यहीं से उनकी परीक्षा भी शुरू हो गई है कि पाकिस्तानी सेना उन्हें किस हद तक आगे बढ़ने की छूट देती है और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ही नहीं बल्कि आतंकी हमलों की साजिश रचने वाले कट्टरपंथी भी वहां सत्ता का हिस्सा है ।  जब कभी इस तंत्र को किसी लोकतांत्रिक सरकार से चुनौती मिलने लगती है तो उसे बेदखल कर दिया जाता है । इसका ताजा उदाहरण नवाज शरीफ हैं जिन्हें भ्रष्टाचार के मामले में सजा मिलने के बाद चुनाव लड़ने से ही वंचित कर दिया गया ।

            22 वर्षों से राजनीति में सक्रिय इमरान खान और उनकी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी को हाल के आम चुनाव में सफलता मिली है । वजह यह भी है कि उन्हें सेना का समर्थन हासिल है । उन्हें अब घरेलू और बाहरी दोनों इस तरह की चुनौतियों से जूझना होगा । जहां तक भारत के संबंधों की बात है तो इसमें तुरंत कोई तब्दीली आएगी ऐसा दिखता नहीं खास तौर से इसलिए भी क्योंकि चुनाव जीतने के बाद उन्होंने पहले ही संबोधन में कश्मीर का मसला छेड़ा था  और यह वही लाइन है जिस पर पाकिस्तान के हुक्मरान बढ़ते रहे हैं ।  उनके पास विकल्प कितने सीमित हैं यह इससे पता चलता है कि उनके मंत्रिमंडल के अधिकांश सदस्य पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और मुशर्रफ की सरकारों में मंत्री रह चुके हैं । यही नहीं उन्होंने शाह महमूद कुरैशी को विदेश मंत्री बनाया है जो कि 2008 से 2011 के दौरान पीपीपी सरकार में तब यह जिम्मेदारी संभाल चुके हैं । जब 26 नवंबर 2008 को मुंबई में पाकिस्तानी आतंकियों ने हमला किया था , असल में यह स्टाफ से जुड़ा मामला है यही वजह है कि पंजाब के अमरिंदर सरकार के मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू की पाकिस्तान में मौजूदगी को लेकर सवाल उठे हैं । बेशक वह पूर्व क्रिकेटर और इमरान के दोस्त होने के नाते वहां गए ,लेकिन पाकिस्तानी सेना प्रमुख बाजवा के गर्मजोशी ने उनकी अपनी कांग्रेस पार्टी के लिए असहज स्थिति पैदा कर दी सीमा पार आतंकवाद को खत्म नहीं किया जाएगा ।  पाकिस्तान और भारत के रिश्ते सहज नहीं हो सकते ।

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