एक लंबी यात्रा के तीन पड़ाव

बीबीसीखबर, रहिए कूलUpdated 24-08-2018
एक
गणेश मिश्रा बीबीसी खबर ।
हर यात्रा जैसे एक चलचित्र की तरह होती है। यात्रा के पहले हम अपनी कल्पना में जैसे उसका पोस्टर सा रचते है , फिर उसको एक चलचित्र सा दृशयमान होता देखते हैं और उसके बाद तो उसकी स्मृति गीतों की तरह बजती है । 
पिछले दिनों ऐसी ही एक यात्रा थी ग्वालियर , शिवपुरी , बटेश्वर और दतिया की। दिल्ली से हम लोग कार से निकले और ग्वालियर और उसके आस-पास पांच-छः दिनों तक इतिहास , पुरातत्व और स्थापत्य का आनंद लेते रहे । लौटते हुए कुछ समय हमने ताज के सम्मोहक सान्निध्य में भी बिताया । हर यात्रा के कुछ दृश्य मन में स्थिर हो जाते है। ऐसे ही तीन दृश्य हैं- सोनागिरी , ताजमहल और बटेश्वर

सोनागिरी सर्पिल रास्ते में सजे मंदिरः
 

सोनागिरी के शिखर से देखो तो नीचे तक के पूरे रास्ते में अनेक मंदिर एक साथ दिखाई देते हैं। क्रमशः नीची होत्री जा रही पहाड़ी के छिपे हुए सर्पिल रास्ते में धवल रंग के अनेक मंदिर मौजूद हैं। सभी में लाल, पीले, सफेद, हरे और गहरे नीले रंगों की पटि्टयों से बनी जैन मंदिरों की पंचरंगी पताकाएं फहर रहीं हैं । 
सोनागिरी के ये सारे मंदिर उतने ही जीवंत हैं जब पहली बार यहां तीसरी शती की चंद्रप्रभु की मुर्ति स्थापित की गई होगी । मंदिरों की विशाल संख्या के साथ-साथ इतने लंबे कालखंड का भान होते ही ऐसा लगता है जैसे सोनागिरी स्पेस और समय दोनों के समन्वय से बनी कोई संरचना हो ।

आ चल बैठें ताज के पीछेः

ताज को जिस ओर से देखो यह हर ओर से उतना ही खबसूरत नजर आता है। सबसे सहज है उसे एकदम ठीक सामने से निहारा जाए। इससे सुंदर दृश्य कोई और नहीं । कितनी सारी तस्वीरें , वृत्तांत और कविताएं इसकी गवाह हैं।
     दूसरा ताज के पास होटल की छत या लॉन से उसे सुबह की चाय पीते हुए देखा जाए । इसके लिए एक अप्रितम जगह है होटल ताज खेमा का लॉन । थोड़ी ऊंचाई पर एक टीले पर विस्तृत से लॉन से ताज के तीन गुबंद नजर आते हैं । ताज का एक बड़ा और दो छोटे गुबंद इतने पास नजर आते हैं कि प्रतीत होता है कि उन्हें हाथ बढ़ाकर छूना कोई कठिन नहीं ।

बटेश्वर-खंडहरों से जन्म लेते मंदिरः

यहां बटेश्वर में सात - आठ शताब्दियों तक सारे के सारे मंदिर खंडहरों की शक्ल में बिखरे पड़े थे। बांयी तरफ की सड़क पर एक विशाल विष्णु मंदिर को देखकर हम जब आगे की ओर बढ़े तो वहा की निर्जनता और एकांत को देखकर यही आभास हुआ कि कहीं हम रास्ता तो नहीं भटक गए। जैसे ही वह  सड़क खत्म हुई , एक अद्भुत दृश्य हमारे सामने था । पेड़ों , झाड़ियों और छोटी पहाड़ियों से घिरे हुए एक साथ छोटे-बड़े दर्जनों मंदिर थे। कुछ मंदिर एक कतार में और कुछ अपने ही अबूझे क्रम में ये सारे मंदिर उस प्रतिहार शैली के हैं जिनका निर्माण आठवीं से गयारहवीं शताब्दी तक उत्तर और मध्य में लगातार होता रहा था । 
इन सारे मंदिरों को देखकर मिथकीय पक्षी फीनिक्स का स्मरण हो आया । जैसे फीनिक्स अपनी राख से पुनर्जीवित होता है, वैसे ही ये मंदिर अपने ही खंडहरों से पुनर्जन्म ले रहे हैं। कुछ का पुनर्जन्म हो चुका है और कुछ अभी भी प्रतीक्षा में हैं ।

 

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