हताशा का आतंक

बीबीसीखबर, संपादकीयUpdated 02-09-2018
हताशा

दिव्यांका शुक्ला , बीबीसी खबर

घाटी में सक्रिय आतंकवादियों का असली चरित्र तब सामने आ रहा है। कभी वे कश्मीरियत की बात करते थे ।अब उनका नकाब उतर रहा है ,जब वह कश्मीरियों को ही निशाना बना रहे हैं ।यह हताशा का नतीजा है । उस हताशा का नतीजा जहां वह चारों ओर से गिर चुके हैं और सुरक्षाबलों की कार्यवाही के बौखलाए हुए हैं ।नतीजा यह है कि अब उन्होंने पुलिस कर्मियों के परिवारों को निशाना बनाना शुरु कर दिया है।  पुलिस वाले तो पहले से निशाने पर थे।  घाटी के अलग-अलग स्थानों से आतंकवादियों ने कई लोगों को अगवा किया है, जिनमें ज्यादातर वरिष्ठ पुलिस कर्मियों को रिश्तेदार हैं ।एक अपहरण पूर्व  मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती  गृहनगर से  भी हुआ है जिसने राजनीति को गर्मा दिया है । हालांकि के सेना ने अपहतों की तलाश में जिस तरह का सघन सर्च अभियान छेड़ा है ,जल्द ही किसी बड़ी कार्यवाई के इन्कार नहीं किया जा सकता ।


 इस पूरे प्रकरण में महबूबा मुफ्ती ने विवादास्पद बयान देकर माहौल को गर्मा दिया है । उन्होंने आतंकवादियों और सुरक्षाबलों को एक ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। महबूबा ने कहा कि 'यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आतंकवादी और सुरक्षा बल दोनों अब बदले की कार्रवाई में एक दूसरों के परिवार को निशाना बनाने लगे हैं' महबूबा का यह कहना है कि किसी भी मामले में परिवारों को निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए , सही हो सकता है लेकिन ऐसे वक्त में जब आतंकवादी आतंक की नई परिभाषा गढ़ते हुए पुलिस वालों के परिजनों को निशाना बनाने लगें ,यह  अनर्गल प्रलाप है राजनीति की भाषा में इसे दोनों पलड़े साधे रखने की जुगत कहा जाता है ,लेकिन एक पलड़े पर आतंकी हो तो यह युक्ति उन्हीं के पक्ष में ज्यादा झुकती है।  कहीं ना कहीं उनके प्रति सदाशयता का प्रदर्शन भी है जो महबूबा की बातों में पहले भी गाहे-बगाहे दिखता रहा है ।


आप की राजनीति जो कहे, आतंकियों और पुलिस वालों को एक ही खांचे में परखना ना तो बुद्धिमता कहा जा सकता है और ना ही सुलझी हुई राजनीति का नमूना । सच तो यह है कि ऐसा बयान किसी भी खांचे  में फिट नहीं बैठता इसे सिर्फ गैर जिम्मेदार कहकर भी नहीं टाला जा सकता ।

    घाटी का आतंकवाद उस दौर में है जहां जल्द ही किसी निर्णायक कार्रवाई की जरूरत है । कश्मीर में अब तक अपनी अपनी सुविधा की राजनीति ही हुई है । हॉलाकि घटनाएं सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं हो गई हैं कि इनमें सुरक्षाबलों और पुलिस के परिवार निशाने पर आए हैं बल्कि इसलिए भी कि  यह सब पंचायत चुनाव पर सुरक्षाबलों की  तैयारियों के बीच हुआ है । आतंकी संगठन कश्मीर में पंचायत चुनाव से पहले दहशत का ऐसा मंजर दिखाना चाहते है , जिसकी गूंज दूर तक सुनाई दे ।

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