क्या है असली पुरुषार्थ

बीबीसीखबर, संपादकीयUpdated 03-09-2018
क्या

दिव्यांका शुक्ला , बीबीसी खबर

हर मनुष्य सुख और आनंद का जीवन जीना चाहता है । बहुत से लोग अपने सदाचरण एंव कर्मठता से सांसारिक आवश्यकताओं की प्राप्ति कर सुख में जीवन जीते हैं ,तो बहुत से लोग भाग्य के सहारे सब कुछ पाने का आसरा लगाए रहते हैं । ऐसे लोग भाग्य में लिखा होगा तो सब कुछ मिलेगा ये सोच कर बैठे रहते हैं , कुछ लोग भगवान ही उनकी इच्छा पूरी करेगा ,यह सोच कर बैठे रहते हैं । जबकि यह सत्य है कि बिना बीज के कोई वृक्ष नहीं होता उसी प्रकार बिना कर्म बीज के बिना फल नहीं लग सकते। धर्म ग्रंथों में धर्म की व्याख्या में यह कतई नहीं कहा गया कि भगवान प्रकट हो आएंगे और भौतिक आवश्यकताओं को पूरी कर देंगे बल्कि इसके विज्ञान को देखा जाए तो धर्म अनुसार जीवन व्यतीत करने से शरीर को संचालित करने वाला हमारा मन मस्तिष्क हताश नहीं होता ।

धर्म ग्रंथों के बताए रास्ते पर सूझबूझ के साथ चलने पर आत्मबल जरूर मजबूत होता है । महाभारत के अनुशासन पर्व में इस बात का उल्लेख किया गया है । एक बार युधिष्ठिर ने इस तरह का प्रश्न भीष्म पितामह से पूछा कि भाग्य के सहारे जीना चाहिए या पुरुषार्थ के सहारे? पितामह भीष्म ने कहा धर्म अपनाने एवं उसके अनुसार जीवन पथ पर चलने से व्यक्ति की सोच व दृष्टिकोण स्पष्ट होती है । वह चमत्कार से भौतिक उपलब्धि में नहीं पड़ता ।वह सदैव सत्य आचरण करता है ,जिससे उसके जीवन में नकारात्मकता नहीं आती ,जबकि भाग्य के सहारे जीने वाला पहले से ही आलसी होता है उसके बाद उसमें ता आ जाती है जिसके कारण दूसरे लोग उसका फायदा उठाते हैं । धर्म के नाम पर ऐसे लोग खूब ठगे  भी जाते हैं ।

भगवान प्रकट होकर सबको उनके मन का दे देंगे  इस ख्वाहिश में पाखंडी लोग दान, दक्षिणा के नाम पर उसके पास जो कुछ धन है उससे हड़प लेते हैं । दान देने एवं लेने के अवसर पर पात्रता पर भी महात्माओं ने खूब चिंतन-मनन के बाद स्पष्ट व्यवस्था दी है । महात्माओं ने मां लक्ष्मी की प्रसन्नता से धन दौलत मिलने की बात कही है । वह अपने लक्ष्य के प्रति निष्ठा से लगे रहना ही बताया है । अतः व्यक्ति को अपने पुरुषार्थ पर ही भरोसा करना चाहिए ।

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