वोट बैंक, राजनीति, और मॉब लिंचिंग

बीबीसीखबर, संपादकीयUpdated 04-09-2018
वोट

 

अगर देश में मॉब लिंचिंग की घटनाएं ऐसे ही बढ़ती रहीं तो वो दिन दूर नहीं जब हम उस जंगल में रह रहे होंगे जहां, हर वक्त छोटे जानवर शेर से अपनी जान बचाने की कोशिश कर रहे होते हैं. 

आशीष शुक्ला, विश्लेषक 

सत्ता की चाह और वोटबैंक की राजनीति आज लोकतंत्र को जितना ज्यादा घाव दे सकती है, दे रही है. और इन्हीं की बदौलत हमारा देश ऐसी दूषित मांसिकता की ओर बढ़ रहा है, जिसे देखकर शायद आतंकी भी घबरा जाए. आतंकियों का क्या उनके लिए लोगों में दहशत फैलाना ही उनका धर्म और कर्म है, लेकिन जिस मांसिकता को लेकर देश आगे बढ़ रहा है, वह शायद इन दहशतगर्दों की सोच से कही ज्यादा घातक है. 

आज देश में जिस प्रकार से मॉब लिंचिंग (भीड़ हत्या) की घटनाएं बढ़ रही हैं, अगर ये ऐसे ही बढ़ती रहीं तो हमारे देश का क्या हाल होगा ये सोचकर रूह काप जाती है. पिछले कुछ सालों में जिस प्रकार से मॉब लिंचिंग की घटनाएं सामने आई हैं, इससे अंदाजा लगाया जा सकता है, कि बीते कुछ सालों में हमारा देश जाने-अनजाने किस मांसिकता का शिकार हो रहा है.

2015 में बकरीद के मौके पर अख़लाक़ नाम के युवक की मौत के बाद से देश में ऐसी घटनाएं बढ़ी हैं. जब अख़लाक़ को इकट्ठी हुई भीड़ ने मार डाला था, तब उस वक्त तमाम राजनेताओं ने वोट बैंक बढ़ाते हुए उनके परिवार के प्रति सहानुभूति जताई थी. तब एक वक्त को ऐसा लगा था कि, शायद इस घटना के बाद सरकार कोई सीख लेगी और लोगों को मार डालने वाली भीड़ के लिए सख्त कानून बनाएगी. लेकिन हमारे देश का दुर्भाग्य है कि, उसी सहानुभूति को बार-बार देकर हमारे राजनेता अपना वोट बैंक बढ़ाना चाह रहे हैं. उन्हे शायद इस बात से फर्क नहीं पड़ता की मौत किसकी हुई है और कौन जिम्मेदार है. 

ऐसी घटनाओं के लिए कोई कठोर कानून होने की वजह से आज लोग इकट्ठा होकर किसी को पीटने में जरा भी संकोच नहीं करते हैं. जिस व्यक्ति के बारे में वो जानते तक नहीं, उसको इस तरह पीटते हैं जैसे उनका पुराना दुश्मन हो. यह आखिर हो कैसे रहा है कि, किसी अफवाह को सुनकर या कोई आधरहीन शक पैदा होने पर और फिर किसी सोची-समझी योजना के तहत एक भीड़ इकट्ठी होती है किसी को पीट-पीटकर जान से मार डालती है? आखिर इतना आक्रोश पैदा कहा से होता है लोगों के अंदर? यह सोचने वाली बात है. 

सवाल उठता है कि, आखिर ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाले लोग जरा भी रहम क्यों नहीं दिखाते हैं? क्या उनके अंदर से मानवता, संवेदनशीलता, खत्म हो गई है? आखिर ये भीड़ कानून को अपने हाथ में लेकर खुद को योद्धा क्यों साबित करना चाहती है? क्या संविधान और कानून पर इन्हें भरोसा नहीं रहा, जो ख़ुद न्याय और नैतिकता के दायरे तय करना चाहती है?. इन सवालों का जवाब शायद कोई दे पाए, क्योंकि इन्हें बढ़ाने और इनका पालन पोषण करने वाला कोई और नहीं बल्कि सरकार है.

देश में बढ़ रहीं ऐसी घटनाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी चिंतित है, लेकिन सत्ता में बैठे नेताओं को जो देश के लिए मर-मिटने की बात करते हैं, उन्हें अपनी लग्जरी लाइफ जीने से फुर्सत ही नहीं है, कि वो देश में हो रही ऐसी घटनाओं पर सख्ती से रोक लगाएं. शायद यही वजह है कि, हाल में सुप्रीम कोर्ट ने इन घटनाओं की रोकथाम के लिए सरकार से कड़े कदम उठाने के आदेश दिए हैं, लेकिन अब ये देखना होगा कि इसपर सरकार की आंख कब खुलती है.

मॉब लिंचिंग जैसे घटनाओं को लेकर सरकार को सख्त होने की जरूरत है, अगर जल्द ही कड़े कानून और कड़ी सजा का प्रावधान नहीं किया गया, तो ऐसी घटनाएं लगातार बढ़ेंगी, जिन्हे रोक पाना आसान नहीं होगा. अभी स्थिति हद में है, अगर ऐसा चलता रहा, तो निश्चित रूप से एक दिन ऐसा आएगा जब हम कदम-कदम पर असुरक्षित महसूस करेंगे. हमें हर वक्त ये डर रहेगा कि, कहीं कोई हमारा शिकार कर ले. हम उस जंगल में रह रहे होंगे जहां, हर वक्त छोटे जानवर शेर से अपनी जान बचाने की कोशिश कर रहे होते हैं. 

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