एशियाड में ब्रॉन्ज जीतने के बाद भी चाय बेचने को मजबूर है हरीश

बीबीसीखबर, अन्य खेलUpdated 09-09-2018
एशियाड

दिव्यांका शुक्ला , बीबीसी खबर

एशियन गेम्स में भारत के लिए सेपकटकरा में ब्रांज जीतने वाले हरीश कुमार चाय बेचने को मजबूर हैं। हाल ही में उनको अपने पिता की चाय की दुकान पर काम करते देखा गया । उनका कहना है कि ब्रांज मेडल शायद मेरी जिद थी जो आज मुझे लोग एशिया का चैंपियन कह कर पुकार रहा है। वर्ना हालात और मजबूरी ने मुझे एक चाय वाला बनाने की ही ठानि हुई है ।

कई बार बेची है चाय

हरीश के पिता मदनलाल का चाय का स्टाल है, जो कॉलोनी के बाहर एक छप्पर के नीचे बना हुआ है और उसे स्टॉल से पेट भरने वाले सात लोग । कई बार हरीश ने चाय बेची है ,लेकिन खेल को नहीं छोड़ा उसके लिए एशियन गेम्स से ब्रांज मेडल तक का सफर काफी परेशानियों भरा है ।

नौकरी की तलाश

उन्होंने कहा मेरा परिवार बड़ा है और आमदनी के जरिए कम है । मैं अपने परिवार को सपोर्ट करने के लिए टी स्टॉल  पर काम करता हूं । मैं प्रैक्टिस रोज दोपहर को 2बजे से 6 बजे तक करता हूं ।अपने भविष्य को संवारने के लिए मैं कोई बढ़िया नौकरी हासिल करना चाहता हूं ताकि मैं अपने परिवार को सपोर्ट कर सकूं ।

2011 में खेल से जुड़े

साथ ही हरीश ने यह भी बताया कि उन्हें इस खेल के बारे में साल 2011 में पता चला था । उन्होंने कहा मैं इस खेल को 2011 से खेल रहा हूं । मेरे कोच हेमराज ने मुझे इस खेल से वाकिफ करवाया था । हम पहले टायर से खेला करते थे और तभी मेरे कोच ने मुझे देखा और स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया ले गए । उसके बाद मुझे महीने का फंड, किट मिलने लगी । मैं रोज प्रेक्टिस करता हूं ताकि मैं अपने देश का नाम रोशन कर सकूं ।

सरकार का शुक्रिया

हरीश को महीने का फंड,किट मुहैया कराने के लिए शुक्रिया अदा करते हुए उनके भाई धवन ने कहा कि सरकार उनके भाई को सरकारी नौकरी दें ताकि वह अपने परिवार का ख्याल रख सके । उनकी मां ने सरकार को हरीश को खाना और सपोर्ट देने के लिए शुक्रिया अदा किया ।

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