खेल पुरस्कारों की जगह अब खेल संस्कृति का समय

बीबीसीखबर, संपादकीयUpdated 18-09-2018
खेल

बीबीसी खबर

देश के खेल पुरस्कारों के लिए नामों की सिफारिश की जा चुकी है । बड़े-बड़े नाम है ऐसे नाम जिन्होंने खेल के मैदान में कीर्तिमान बनाते हुए देश का नाम रोशन किया है । यह हमारे लिए गर्व की बात है कि हम ऐसे प्रतिभावान खिलाड़ियों को हर साल सम्मानित कर उनके हौसले को सलाम करते हैं । अब समय इससे भी आगे जाने का है । हाल ही में समाप्त एशियाई खेलों में भारतीय खिलाड़ियों के प्रदर्शन को देख दुनिया में सभी ने सराहा । इसमें भी ऐसे खिलाड़ियों की संख्या काफी रही थी, जिन्होंने अभावों के बीच भी अपने प्रदर्शन में निरंतर निखार किया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को साबित किया । एशियन गेम्स में अब तक की सबसे बेहतरीन मेडल टैली इसी तरफ इशारा कर रही है कि अब देश में खेलों को लेकर जज्बा भी बढ़ा है और स्वीकारोक्ति भी बढ़ी है ।  फिर भी अभी हम खेलों को उनकी वह पहचान समाज में दे पाने से दूर हैं जो कई अन्य देशों में मौजूद है । हर साल दिए जाने वाले पुरस्कारों का स्वागत सम्मानित खिलाड़ियों का भी अभिनंदन है ,लेकिन देश के छोटे-छोटे शहरों ,कस्बों और  गांवो में खेल प्रतिभाओं को भी अब और ज्यादा सम्मान ,पहचान और अवसर प्रदान करने होंगे। खेल नीति जमीनी स्तर पर काम करे,यह सुनिश्चित करना होगा एक खेल ढांचा पूरे देश में पहले से ही स्थापित है ,लेकिन अभी इसका एक बड़ा हिस्सा सरकारीकरण का विकार है सुविधाएं या तो कम है या सही से काम नहीं कर रही हैं । प्रशिक्षण का स्तर भी चिंता का विषय है ।

  दूसरी अहम बात है भारत के करोड़ों अभिभावकों की सोच खेल को लेकर जागृति आई है ,लेकिन एक खेल संस्कृति का अभाव भी है । महज औपचारिकता से काम नहीं चलेगा । एक्सीलेंट की ओर बढ़ना होगा । हमें खिलाड़ियों के सम्मान के साथ ही खेल का भी सम्मान सुनिश्चित करना होगा । उद्देश्य तब पूरा होगा ,जब हर वर्ष खेल रत्न पाने के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा हो । जिले से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक मानक इतने इतने ऊंचे हो जाएं कि हम ओलंपिक के स्तर पर स्वयंमेव  पहुंच सके ।

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