हो कहीं, पर हो खुशहाली

बीबीसीखबर, संपादकीयUpdated 06-11-2018
हो

डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज

मेरी तो आदत ही ख़राब है। हो सकता है मेरी इस आदत से आप लोगों को परेशानी होती हो कि हर बात में पता नहीं क्यों मैं किसी कवि की 20-30 या उससे भी पुरानी कविता लेकर आ जाता हूँ। अब इसी को लीजिए कि किसी ने कहा नहीं मुझसे पर पता नहीं क्यों आज फिर दुष्यंत याद आ गए। उनका एक शेर है।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,

हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

अब इन पंक्तियों को क्षमा प्रार्थना के साथ मैं कुछ इस तरह कहना चाहूँगा

मेरे घर में नहीं तो तेरे घर में ही सही

हो कहीं भी पर खुशहाली होनी चाहिए।

दिवाली पर यह सब याद आना स्वाभाविक है। डॉलर 80 के करीब हो गया हमारे पास डॉलर है नहीं, चाहिए भी नहीं, और चाहें तो मिल भी नहीं सकता। इसलिए कुछ ख़ास परेशानी हमें नहीं है। वैसे भी डॉलर खास लोगों का मसला है, हम तो आम हैं। आम इस बार बहुत महंगा नहीं था, बड़ी राहत थी। सब्जी महंगी थी तो क्या हुआ, आम तो सस्ता था। फिर जिनके घर सब्जी थी उनके यहाँ से बघार की खुशबू पड़ोसी के घर तक तो पहुँचती ही है।

खास लोगों की खुशहाली की महक आम लोगों तक पहुँच जाएगी तो वे धन्य हो जाएंगे। बल्कि हो क्या जाएंगे, होते ही हैं। शेयर मार्केट चढ़ता है तो लोगों की बांछे खिलने लगती हैं गिरता है तो लोग परेशान हो जाते हैं। भारत ने अर्थव्यवस्था में फ्रांस को पछाड़ कर छठा स्थान प्राप्त कर लिया तो लोग नाचने लगे। देश में अरबपतियों-करोड़पतियों की संख्या बढ़ गई तो फटा सुथन्ना पहने हरचरना झूमने लगा।

सरकार ने कहा है कि सुनहरे दिन आने वाले हैं। हमने दरवाजा पूरा खोल दिया है, शायद गलती से घुस आए या पता भूल जाए और हमारे यहाँ चला आए। बहुत इंतजार किया। घर में मक्खी व मच्छर घुस गए, हम इंतजार करते रहे। जरा सी आहट होती है तो दिल बोलता है, कही ये वो तो नहीं कही ये वो तो नहीं, गाना अच्छा था। आहट हुई तो हमने बड़ी उम्मीद से दरवाजे की तरफ देखा, कुकुर महोदय थे। मुझे देखता देख कर भाग गए। गुलजार साहब कह चुके हैं

हमने दरवाजे तक तो देखा था

फिर न जाने गई किधर तन्हा।

संत लोग कह गए है, जगत मिथ्या है, सब माया है, इससे मुक्ति जरूरी है। इतना कहकर वे भक्तों की माया को अपनी अंटी में करते हुए उन्हें पाप मुक्त कर देते हैं। आखिर भक्तों के पापों को वह नहीं अपनाएंगे तो कौन अपनाएगा? सरकार का काम भी कुछ ऐसा ही है। गरीब कहते हैं हमारी गरीबी मिटाओ। सरकार कहती है मिटा कर ही दम लेंगे। सरकार अपनी तरफ से प्रयास करती है। जैसे संत-महात्मा लोग करते हैं। अब पापी पाप से मुक्त न हो पाए और गरीब अपनी गरीबी को छोड़े ही नहीं तो इसमें सरकार का या संत-महात्माओ का क्या दोष।

लगता है विषय से भटक रहा हूँ। आम आदमी के साथ यही दिक्कत होती है, अक्सर भटक जाता है, या कहें कि बस भटकता ही रहता है। सरकार भी क्या करे। गरीबों को गरीबी से मुक्त करने के लिए बैकों से कर्ज की व्यवस्था कर रखी है। कर्ज के डूबने का प्रावधान भी कर रखा है। इसके बाद भी गरीब है कि अपना स्वाभिमान छोड़ना नहीं चाहता, कर्ज लेने को बुरा मानता है। चरक क्या मूर्ख थे जो कर्ज लेकर घी पीने की सलाह दे गए! सरकार क्या मूर्ख है जो अमेरिका, जापान और न जाने किस-किस से कर्ज लेकर जनता का विकास करना चाहती है। जनता है कि इतनी सी बात नहीं समझती।

सरकार को सहयोग नहीं देती। नीरव मोदी, मेहुल, माल्या को देखो कैसे कर्ज लेकर विकास कर गए। कल तक देसी थे, आज विदेशी हो गए हैं। कल आएँगे तो एनआरआई बन कर आएँगे। हम हमेशा देसी ही रह जाएँगे। पर कोई गम नहीं क्योंकि दुष्यंत कह गए हैं:-

दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,

और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।

 

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