सम्मान न देना और बढ़ती अपेक्षाएं सम्बंधों के टूटने की ओर इशारा करती हैं

बीबीसीखबर, रिलेशनशिपUpdated 08-01-2019
सम्मान

 बीबीसी खबर

रिश्ते की नींव दो लोगों के परस्पर सहयोग पर टिकी होती है, लेकिन कभी रिश्ते के बीच दरार आ जाए और मेल की कोशिश में आप अकेली हों तो सब छोड़कर जीवन में आगे बढ़ जाना स्वार्थपरता नहीं, आत्मसम्मान है। अजय और रिया पिछले दो वर्षों से साथ हैं। दोनों शिक्षित हैं, अपने जीवन के फ़ैसले लेने में सक्षम हैं और दोनों प्रतिष्ठित कंपनी में जॉब करते हैं। शुरुआती कुछ महीने तक तो सब ठीक रहा लेकिन पिछले कुछ समय से दोनों के बीच अनबन रहने लगी है। रिश्ते में ख़ुशी के मौक़े न के बराबर हो गए हैं। छोटी-छोटी बातों पर खींचतान बढ़ने लगी है। ऐसे में ज़रूरत है कि दोनों को साथ में बैठकर रिश्ते के बारे में दोबारा सोचने की।

जब दो लोग एक रिश्ते में आते हैं तो पहले अपना सर्वश्रेष्ठ देते हैं अपनी सारी अच्छाइयां सामने ले आते हैं। लेकिन धीरे-धीरे उनके व्यक्तित्व के दूसरे पहलू भी सामने आने लगते हैं। ऐसे में दोनों उस पहले वाले व्यवहार को ही वास्तविकता मान लेते हैं और फिर उन्हीं चीज़ों को देखना पसंद करते हैं। वे यह नहीं समझ पाते कि वक़्त के साथ कई बदलाव होते हैं। ऐसे में रिश्ते को नए बदलावों के साथ स्वीकार करना ज़रूरी होता है। ऐसा न होने की स्थिति में रिश्ते में बिखराव होना लाज़मी है। 


हर रिश्ते में अपेक्षाएं होती हैं और समय-समय पर ज़रूरी भी हैं। लेकिन हर समय अपेक्षा करना सामने वाले को आपसे दूर ले जाता है। कई बार मूड ठीक न होने पर चुप रहना भाता है, ऐसे में इस तरह के व्यवहार को अन्यथा लेना रिश्ते में दूरी को बढ़ा सकता है। रिश्ते की शुरुआत में जिस रूमानियत की जगह होती है उसे बरकरार रखना भी ज़रूरी है, ताकि रिश्ते को वही ताज़गी से भरा जा सके। लेकिन हर समय उम्मीदों को लादना रिश्तों में बोझ की बढ़ा देता है, जिससे व्यक्ति दूर भागने लगता है। 


मुझे तुम्हारा यह तरीक़ा पसंद नहीं है या यह बात बेहद बुरी लगती है, पहले तुम ऐसी नहीं थी। यहां इस बात को समझना बेहद ज़रूरी है कि कोई भी व्यक्ति हर समय वैसा नहीं हो सकता जैसा आप चाहते हैं। किसी को भी पूर्णत: बदलना मुमकिन नहीं होता। यदि यह बदलाव भलाई के लिए हो तब तो ठीक है। लेकिन छोटी-छोटी चीज़ें जैसे कपड़े पहनने का सलीक़ा या बोलने का ढंग पसंद नहीं आना और इन्हें बदलने की कोशिश करने का अर्थ कई बार आप पर हावी होना भी होता है। 

 

साथ रहने पर लोग एक-दूसरे के प्रति लापरवाह हो जाते हैं। इसके दो पहलू हैं। पहला सम्मान खोना और दूसरा बात करने के तरीक़े में बदलाव आ जाना। जब तक रिश्ते में सबकुछ सही रहता है तब तक आपसी बातचीत का तरीक़ा सही रहता है। वहीं थोड़ी सी परेशानी आते ही रिश्तों की अहमियत घट जाती है, भाषा निकृष्ट हो जाती है। यानी कि एक-दूसरे के प्रति सम्मान कम हो जाता है। ऐसे में ज़रूरी है कि एक दूसरे की व्यक्तिगत आज़ादी बनी रहे और रिश्ते की गरिमा को भी बरकरार रखा जा सके।


सबसे ज़रूरी है कि अपने आत्मसम्मान और रिश्तों को अलग लेकर चलें। किसी का व्यवहार आज जैसा है, आगे भी वैसा ही रहेगा और अगर आप ऐसा रिश्ता निभा पाएं तो ठीक लेकिन जवाब 'नहीं' है तो आगे बढ़ जाना ज़रूरी है। लोग दो तरीक़ों से आगे बढ़ते हैं। पहला आगे बढ़कर किसी और रिश्ते में बंध जाना, दूसरा अपने अनुभवों से सीख कर आगे बढ़ना। जो पुराने रिश्तों से कुछ सीख कर आगे बढ़ते हैं वे लोग सामंजस्य बैठाने में कुशल हो जाते हैं, उनकी अपेक्षाएं कम हो जाती हैं, वे बेहतर तरीक़े से रिश्ते सम्भाल सकते हैं और पुरानी ग़लतियों को दोहराते नहीं।

 

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