चुनाव की बिसात पर जाति की गोटी

बीबीसीखबर, संपादकीयUpdated 22-01-2019
चुनाव

 डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज

देश के लगभग सभी राजनीतिक दल चुनाव की बिसात पर जाति की गोटी खेलने के इतने अभ्यस्त हो गये हैं कि उन्हें इस बात तक का भान नहीं रहता कि ऐसे किसी कदम से उन्हें कभी भी लाभ नहीं हुआ है। पिछले साल पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव से कुछ ही समय पहले सर्वोच्च न्यायालय के आदेश कि एससी-एसटी एक्ट के तहत प्राथमिकी दर्ज होते ही गिरफ्तारी नहीं की जानी चाहिए, राजनीति में उबाल लाने वाला साबित हुआ था। विपक्ष को केंद्र में आसीन भाजपा सरकार को घेरने का मौका मिल गया था। देश भर में इसके विरोध में दलितों को एकजूट कर आंदोलन किया गया। आसन्न चुनावों के कारण भाजपा के लिए यह एक विकट स्थिति थी। इसलिए उसने कानून में संशोधन के रास्ते दलितों को मनाने और अपने पक्ष में करने का प्रयास किया गया। परंतु नतीजा क्या निकला, भाजपा के हाथ से तीन राज्य मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तिसगढ़ निकल गये। वहां के चुनाव परिणामों का विश्लेषण बताता है कि वहां एससी व एसटी के वोट भाजपा को पहले की तुलना में कम मिले जो उसकी हार का कारण रहा।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ। जब केंद्र में कांग्रेस शासन में थी तब जाटों का आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन हुआ था जिसकी गूंज पूरे देश में सुनाई दी थी और कई अन्य जातियों ने भी आरक्षण की मांग उठायी थी। उस समय कांग्रेस ने जाटों व अन्य समुदायों को अपने पक्ष में करने के लिए उन्हें आरक्षण दे दिया, पर उसे फिर भी वोट नहीं मिले। जाति की राजनीति करके सत्ता में आने वाली बहुजन समाज पार्टी और सपा को भी हर बार कामयाबी नहीं मिली, बल्कि 2014 के लोकसभ चुनावों में तो उनकी लुटिया ही डूब गयी थी। ऐसे में अब जब केंद्र में आसीन भाजपा आगामी लोकसभा चुनावों को देखते हुए सवर्णो और अन्य पिछड़ा वर्ग को रिझाने की कोशिश कर रही है तब यह कहना मुश्किल है कि उसे इसका कितना लाभ मिलेगा।

तीन राज्यों में सत्ता से बाहर होने और पिछले साल उत्तर प्रदेश के उप चुनावों में मिली हार के बाद भाजपा के सामने एक नया संकट है। इस साल लोकसभा चुनाव होने हैं और पिछले कुछ समय से जो राजनीतिक वातावरण बन रहा है उसमें उसके लिए यह जरूरी हो गया है कि वह समाज के उन वर्गों को साधे जो उससे छिटकते जा रहे हैं। एससी-एसटी एक्ट में न्यायालय के निर्णय को पलटने की सरकार की कवायद से माना जा रहा है कि सवर्णों में नाराजगी है। इसके लिए सरकार ने गरीब सवर्णों को दस प्रतिशत आरक्षण की घोषणा कर दी। अपनी इस पहल में संवैधानिक अवरोधों से वह भी अनभिज्ञ नहीं है फिर भी उसने यह कदम उठाया। इतना ही नहीं, सरकार ने यह भी घोषणा कर दी है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में गरीब सवर्णों के लिए रोजगार व शिक्षा के अवसर बढ़ाने के लिए इसी सत्र से 25 फीसदी सीटें बढ़ायी जाएंगी। विपक्ष ने भी इसमें उसका साथ दिया क्यांकि उसके लिए सवर्णों को यह संदेश देना जरूरी था कि वह उनके हितों की रक्षा में पीछे नहीं रहेगी। ऐसा इसलिए भी जरूरी था क्योंकि अदालत के निर्णय के विरोध में दलितों को खड़ा करने में वह सबसे आगे थे। सवर्ण कोई जाति नहीं है पर एससी-एसटी बनाम सवर्ण में वह भी जाति न सही पर जातियों का समूह बनकर सामने आता है। 

भाजपा के लिए सवर्ण ही नहीं अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाता भी एक बड़ा सवाल है। सरकार ने इस वर्ग को, जिसमें कई जातियां शामिल हैं, साधने के लिए पहले अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधनिक दर्जा दिया अब वह आयोग को और मजबूत बनाकर एक साथ अन्य पिछड़ी जातियों के वोट अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है। बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने गरीब सवर्णों को दिये जाने वाले आरक्षण की तरह गरीब मुसलमानों के लिए भी आरक्षण की मांग कर दी है।

एक तरफ भाजपा सरकार की जातियों को आरक्षण और विशेष दर्जा देने की रणनीति है तो दूसरी तरफ बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी गठजोड़ कर नयी जातीय गोटियां बैठाने की कोशिश में हैं। उत्तर प्रदेश के उप चुनावों में मिली सफलता के बाद उन्हें लग रहा है कि कम से कम उत्तर प्रदेश में वह भाजपा को रोक सकते हैं। विड़ंबना यह है कि भाजपा और कांग्रेस भी इस स्थिति को समझते हुए चुनाव की बिसात पर जाति की गोटियां बिछाने की कोशिश कर रही हैं। इसके लिए ऐसे जाति आधारित दलों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश है जो उन जातियों के वोटों के ठेकेदार हैं। आजादी के बाद कई दशक तक कांग्रेस दलितों-पिछड़ों के वोटों पर एकछत्र अधिकार रखते हुए सबकों हराती रही पर अब वैसी स्थिति नहीं है। ऐसे में तीन राज्यों में भाजपा से सत्ता छीनने के बाद वह फिर से केंद्र में आने के लिए अपनी गोटियां फिट करने में लगी है। जातीय राजनीति को जन्म देने के बाद भी अब वह उसके नियंत्रण में नहीं है। इसके बाद भी तीन राज्यों में उसे जिस प्रकार एससी-एसटी के अधिक वोट मिले हैं उससे उसे लगता है कि उसकी राह कुछ आसान होगी। इसीलिए वह अपनी जातीय रणनीति को नया रूप देने की कोशिश कर रही है। कौन सा दल किन जातियों की गोटियों को अपने खाने में फिट कर पाएगा यह तो समय ही बताएगा परंतु इसमें कोई शक नहीं कि इस जातीय राजनीति के कारण एक भारतीय समाज की अवधारणा निरंतर कमजोर ही होगी।

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