शहीदों के लिए जागती सामयिक देशभक्ति

बीबीसीखबर, संपादकीयUpdated 20-02-2019
शहीदों

 बीबीसी खबर

दो दिन हो गए, TV पर देख रहा हूँ कि पूरे देश का खून उबल रहा है, सबकी देशभक्ति चरम पर है, सबको देश के सैनिकों की चिंता है, सब सैनिकों के सम्मान में मोमबत्ती मार्च और पुतला फूंकने में लगे है, फेसबुक और व्हाट्स एप्प पर हर कोई सैनिकों के सम्मान में एक से बढ़कर एक संदेश पोस्ट कर रहे है। शहीदों का इतना भारी सम्मान देखकर मुझे आपने सैनिक होने पर बड़ा गर्व महसूस हो रहा है, मैं अभिभूत हो रहा हूँ और इन लोगो को प्रति कृतज्ञ हो रहा हूँ।

 

कल फेसबुक पर देखा कि मेरे गृहनगर में भी मोमबत्ती मार्च निकाला, लोगो ने शहीदों के प्रति चिंता जतायी, सेल्फी ली, वीडियो बनाये और रोष भरे बयान भी दिए, फिर सब फेसबुक और व्हाट्स एप्प में डाल दिया। इन सबका सैनिक प्रेम देखकर मैं बड़ा अभिभूत हो गया।

मैं अपने गृहनगर के इन्ही लोगो के बीच मे पला बढ़ा और इस देश  रक्षा की नौकरी में अधिकारी बनकर आया। आज लगभग 22 साल हो गए मुझे कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर भारत मे अंतराष्ट्रीय सीमा की रक्षा और आतंकवाद विरोधी अभियान में कार्य करते हुए, नक्सल विरोधी अभियान से लेकर चुनावो में सुरक्षा प्रदान करते हुए। मैंने भी कई बार मौत को बहुत नजदीक से देखा है, मगर बस मैं अभी तक शहीद नहीं हुआ।

 

मेरे गृहनगर के लोग, मेरे बचपन के दोस्त और मेरे पड़ोसी भी धीरे धीरे मुझे भूलते जा रहे है पर मैं उन्हें नहीं भुला। मैंने अभी तक अपना गृहनगर नहीं छोड़ा, हर छुट्टियों में वहीं रहने जाता हूँ। पर इन देशप्रेमी मोम्बात्ति जलाने वालों में से कोई मुझसे कभी भी मिलने नहीं आता। यद्यपि मैं गृहनगर में घर पहुंचकर सबसे पहले अपने फेसबुक पर भी डाल देता हूँ कि मैं घर आया हुआ हूँ, ताकि सबको पता चल जाये कि मैं घर आया हूँ और शायद कोई मिलने आ जाये। पर कुछ लोग फेसबुक पर पूछते तो है कि कबतक हो, मगर आते कभी नहीं। बाजार में निकलता हूँ तो कुछ जाने पहचाने लोगो से आमना सामना होता है तो हमेशा वो बस दो सवाल ही पूछते है "और कब आये?" "और आजकल कहाँ हो" ......बस इतने पर ही उनका सारा सैनिक प्रेम और देशभक्ति खत्म हो जाती है उनकी। बाकी उन्हें कोई मतलब नहीं कि मैं कैसे हूँ, घर मे सब कैसे है, माँ कैसी है, बच्चे कैसे है.............शायद सब व्यस्त है अपने जीवन मे और वैसे भी मैं तो अभी ज़िन्दा हूँ, शहीद थोड़े ही हुआ हुँ जो वो घर आएंगे।

मेरे पिताजी ने बड़ी ईमानदारी से कमाए पैसों से गृहनगर की एक पूर्णतया अनुमोदित सहकारी आवासीय कॉलोनी में एक घर बनाया, पूरे पैसे दिए, रजिस्ट्री करायी, नक्शा पास कराया....सब कुछ वैध किया, मगर फिर भी आजतक उस घर तक पक्की सड़क नहीं है, कच्ची है जो बरसात में डूब जाती है, मैं खुद के घर मे कीचड़ में डूबकर जाता हूँ। मगर पिछले 22 साल में इन्ही मोमबत्ती जलाने वालों को कभी फिक्र नहीं हुई कि इस सैनिक के घर के रास्ते की सड़क ही बनवा दे, नगरपालिका के पानी की पाइप लाइन ही बिछवा दे। फिक्र शायद इसलिए नहीं हुई क्योंकि अभी मैं ज़िंदा हूँ, अभी शहीद नही हुआ हूँ

आप जाइये कभी मेरी कॉलोनी में आपको न सड़क मिलेगी और न नाली। लगभग 2 वर्ष पहले तक मेरे खुद के घर का पानी एक पड़ोस के प्लाट में जाता था, जो मेरे ही एक बचपन के मित्र ने खरीद लिया और उसमें मिट्टी भरवा दी, अब नाली न होने की वजह से पानी कहीं भी जाना बन्द हो गया, मेरे घर के बाहर पानी भर गया। माँ परेशान, मुझे बार बार फोन करे, मैं अपने दोस्तों को फोन करूँ, मगर किसी को फुर्सत नहीं, सब व्यस्त है सबके अपने व्यक्तिगत मुद्दे है मैंने नगर के हर संभ्रांत नागरिक, पालिका सदस्य, पालिकाध्यक्ष कर किसी से निवेदन किया मगर सबकी अपनी राजनीति, किसी को फिक्र नहीं। क्योंकि मैं तो ज़िंदा था, शहीद नही हुआ था। कल वो सब लोग भी शहीदों के लिए अपने प्रेम और चिंता को व्यक्त कर रहे थे और मोमबत्ती जला रहे थे। हालांकि किसी शुभचिंतक के सहयोग से तत्कालीन जिलाधिकारी ने इसमें मेरी मदद की, मगर ये मोमबत्ती वाले नही आये।

मेरी बूढ़ी माँ घर पर ही रहती है। वृद्धावस्था की सारी बीमारियां है उनको, ठीक से चलफिर भी नही पाती। जब घर के सामने उस कच्ची सड़क में पानी भरकर कीचड़ हो जाती है तो मेरी माँ को डॉक्टर के ले जाने के लिए रिक्शा भी घर के दरवाजे तक नही आ पाती, बेचारी पता नही कैसे जाती है। पर ये सैनिकों के प्रति चिंता करने वाले लोगों कभी मेरी उस माँ की चिंता नही हुई, क्योंकि उन्हें सिर्फ भारत माता की फिक्र है, भारत माता की रक्षा करने वाले कि माँ की नहीं। कल मेरे मुहल्ले के भी कई लोग देशप्रेम की मोमबत्तियां जला रहे थे, मगर देश की सीमा पर तैनात सैनिक की माँ की खैर खबर लेने उनमे से कभी कोई घर नही आता, शायद व्यस्त है वो सब अपने मे और मैं भी तो अभी जीवित हूँ, अभी मैं शहीद नहीं हुआ हूँ।

मैं फेसबुक पर अपने गृहनगर में होने वाली गतिविधियों को देखता रहता हूँ, तरहः तरहः के आयोजन होते रहते है। मुख्य अतिथि के साथ फोटो खिंचवाने की होड़ सी लगी होती है और फिर इन्हें फेसबुक पर डालकर अपने वजूद को साबित करने की प्रतिस्पर्धा। पर सभी आयोजनों में एक बात बात कॉमन होती है कि मुख्य अतिथि या तो कोई पुलिस अधिकारी है या फिर प्रशाशनिक अधिकारी या फिर विधायक जी। बचपन से अभीतक मैंने किसी कार्यक्रम में में किसी सैनिक को मुख्य अतिथि नहीं देखा। यद्यपि मेरे गृहनगर के आसपास सैन्य बलों में कार्यरत सैनिकों की कोई कमी नहीं, जो छुट्टी पर आते रहते है। इन लोगो ने कभी शायद जानने की कोशिश ही नही की कौन कौन सैन्य बलों में काम करते है और इनमें से कुछ वीरता के मेडल भी पाए हुए है। पर ये सब तो अभी ज़िंदा है, शहीद नही हुए है, फिर कैसा सम्मान। सैनिक तो सिर्फ मरने पर ही सम्मान का अधिकारी है न।

मैं अक्सर फेसबुक पर अपने गृहनगर और उसके आसपास के विद्यालयों में आयोजित कार्यक्रमों को देखता हूँ कि कोई भी सैनिक शहीद होता है तो वहाँ भी मोमबत्तियां जलती है, सैनिकों के सम्मान में नारे लगते है, छात्र स्लोगन लिखी तख्तियां लेकर फ़ोटो खिंचवाते है, अखबार में खबर छपती है। मगर जब भी उन विद्यालयों में कोई अन्य विशेष कार्यक्रम होता है तो मुख्य अतिथि के तौर पर वही पुलिस अधिकारी और प्रशाशनिक अधिकारी आमंत्रित होता है, कोई सैन्य बलों का कार्मिक नहीं। मैंने एक बार किसी से पूछा कि ये स्कूल मालिक लोग तो संभ्रांत लोग है फिर ये पुलिस वालों को बुलाते है, पुलिस वालों से शिक्षा वालों का क्या काम, तो उसने मुझे समझाया कि पुलिस अधिकारियों से संबंध होने से समाज मे वज़ूद बढ़ता है। मुझे लगा शायद वो सही भी है, सैनिकों को बुलाने से तो वज़ूद नहीं बनेगा। हाँ अगर सैनिक शहीद हो जाये तो उसके लिए नारे लगाने, मोम्बात्ति जलाने और प्रेस को वक्तव्य देने से वज़ूद जरूर बनता है।

शुरू शरू में जब मैं भी सैनिक बना तो मुझे लगा कि शायद सरकारी दफ्तरों में हमारी लिहाज़ तो होगी ही, मगर धीरे धीरे समझ मे आया कि "बाबू जी" को किसी की लिहाज़ नही बस उन्हें तो बस "वो" चाहिए। अब नैतिकता के नाते मुझे स्वयं तो "वो" देने में शर्म आती है इसलिए कुछ शुभचिंतकों के माध्यम से "वो" देकर काम करवाना पड़ता है, जबकि काम वैध है। बंदूक के लाइसेंस के रिन्यूल से लेकर गाड़ी ट्रांसफर तक, हर काम मे "वो" देना पड़ता है, जबकि काम के कागजो में सैन्य वर्दी में फ़ोटो भी लगा है। कल वो सब "बाबू जी" भी शहीदो के लिए मोम्बात्ति जलाकर  सैनिकों के लिए चिंतित थे। मगर जो ज़िन्दा सैनिक है, उनकी उन्हें चिंता नही है। सम्मान तो मरने पर ही मिलेगा न।

अक्सर मेरे अधीन कार्यरत सैनिक मेरे पास आते है, सरकारी कार्यालयों में काम न होने, तहसील थानों में सुनवाई न होने की समस्याएं लेकर आते है, मैं उन विभागों को पत्र लिखता हूँ, संबंधित अधिकारियों को फोन करता हूँ, तब बड़ी मुश्किल से कोई कोई समस्या हल हो पाती है। पर ये शहीदो के लिए लगते नारे, जलती मोमबत्तियां देखकर मुझे लगता है कि ये सम्मान और चिंता जब क्यों नही जगती जब सैनिक खुद ज़िन्दा है।

मैंने तो जिंदगी और मौत को बहुत नजदीक से देखा है, मैंने अपने शहीद साथियों के ताबूतों को कंधा दिया है, मैंने शहीदो के घरों से आने वाली चिठ्ठियों को पढ़ा है जो वो बाद में होने वाली समस्याओं के बारे में लिखते है, तब न कोई मोमबत्ती वाला उनके घर मदद करने आता है और न कोई फेसबुक पर देशभक्ति दिखाने वाला।।

खैर मैं फिर भी अनुग्रहित हूँ इन सब लोगो का, ज़िन्दा न सही, मरने पर तो भारी सम्मान देते है। देश रक्षा तो मेरा कर्म है, धर्म है वो सम्मान का भूखा नहीं बल्कि शत्रु के खून का भूखा है। मैं अपने फ़र्ज़ से कभी विमुख नहीं होऊंगा, ये वादा है आपसे।

सरहद पर आपकी सुरक्षा पर खड़ा एक सैनिक आभार

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