सोशल मीडियाः समस्या दुरूपयोग रोकने की

बीबीसीखबर, संपादकीयUpdated 27-03-2019
सोशल

 वेद प्रकाश भारद्वाज

सोशल मीडिया की जीवन में बढ़ती भूमिका का ही नतीजा है कि आज सभी राजनीतिक दलों के अपने आईटी सेल हैं जो सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को अपने पक्ष में करने का काम करते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में यह बात सामने आयी थी कि भाजपा ने सोशल मीडिया का आक्रामक इस्तेमाल किया था और उसके बाद वह लगातार सोशल मीडिया का उपयोग करती रही है। उसकी देखा-देखी अन्य दल भी अब सोशल मीडिया पर ध्यान देने लगे हैं। हालांकि पिछले साल हुए पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद यह आकलन भी सामने आया था कि सोशल मीडिया से चुनावों को प्रभावित नहीं किया जा सका। पर इसमें शक नहीं कि आज राजनीतिक दलों की मजबूरी हो गयी है कि वह अपना राजनीतिक आधार बढ़ाने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल करें। ऐसे में लोकसभा चुनावों के संदर्भ में सोशल मीडिया मंचों द्वारा तैयार आचार संहिता को स्वीकार करते हुए चुनाव आयोग द्वारा सोशल मीडिया पर पार्टियों को प्रचार चुनाव के 48 घंटे पहले बंद करने का निर्देश आना बहुत चौंकाता नहीं है। राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा इस बात का विश्लेषण किया जाने लगा था कि कौन-कौन पार्टी सोशल मीडिया का किस स्तर पर इस्तेमाल की तैयारी किये हुए है। यही वजह है कि इस मामले में सोशल मीडिया कंपनियां और चुनाव आयोग के सफल हो पाने की संभावना को लेकर अभी से शंकाएं प्रकट की जाने लगी हैं। सोशल मीडिया मंचों के लिए ऐसी पहल करना जरूरी हो गया था। पिछले साल अमेरिका और इंग्लैंड के चुनावों के साथ ही भारत में 2014 के आम चुनावों में सोशल मीडिया की भूमिका संदेह के घेरे में रही है। इस संदर्भ में अमेरिका सहित कुछ देशों ने फेसबुक सहित कुछ मंचों पर आर्थिक जुर्माना भी लगाया था। भारत में ऐसी कोई कार्रवाई तो नहीं की गयी परंतु सरकार ने उसपर नियंत्रण की एक पहल की थी जिसे बाद में वापस लेना पड़ा। इन सबको देखते हुए सोशल मीडिया मंचों ने खुद पहल करके आचार संहिता बनायी है ताकि उन पर कोई अंगुली न उठा सके।

इसके बाद भी, यह मान भी लिया जाए कि सोशल मीडिया मंच और चुनाव आयोग राजनीतिक दलों को सोशल मीडिया पर चुनाव से 48 घंटे पहले प्रचार से रोकने में सफल हो भी गया तो क्या वह उन फेक न्यूज को रोक पाएगा तो राजनीतिक दलों द्वारा नहीं बल्कि उनके ऐसे भक्तों द्वारा फैलाई जाती है जो यह मानकर चलते हैं कि किसी एक खास राजनीतिक दल की सरकार बनते ही उनके जीवन का कायाकल्प हो जाएगा। ऐसे लोगों की तादाद भी कम नहीं है जो किसी एक राजनीतिक दल की जीत में अपने धर्म, जाति, समुदाय आदि की जीत देखते हैं और अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए किसी प्रकार की गलत बातों को हवा दे सकते हैं। 

भारतीय निर्वाचन आयोग के ताजा निर्देश के परिप्रेक्ष्य में यदि हम राजनीतिक दलों की कथनी और करनी अब तक चली आ रही आदतों पर गौर करें तो यह विश्वास करना आसान नहीं होगा कि वह आयोग के निर्देश का पूर्ण पालन करेंगे। हकीकत तो यह है कि सभी राजनीतिक दल चुनाव आयोग के निर्देशों की अवमानना से कभी नहीं चूकते। फिर सोशल मीडिया पर उनका अपराध साबित करना तो लगभग असंभव ही है। वह खुद प्रचार न करके अपने कार्यकर्ताओं के असली या नकली एकाउंट बनवाकर भी प्रचार जारी रख सकते हैं। और एक बार को मान भी लिया जाए कि सोशल मीडिया का उपयोग बंद हो जाएगा तब भी क्या इस बात की किसी को चिंता है कि राजनीतिक दल सोशल मीडिया का गलत इस्तेमाल नहीं करेंगे? वह ऐसी किसी भी सूचना के निर्माण और प्रसार को बढ़ावा नहीं देंगे जो पूरी तरह तथ्यहीन होगी और लोगों को भ्रमित कर उन्हें वांछित राजनीतिक दिशा में बढ़ने को प्रेरित करेगी।

दरअसल चुनाव के दौरान या उससे पहले भी सोशल मीडिया पर गलत या भ्रामक जानकारियों के माध्यम से अपने पक्ष में माहौल बनाना और विरोधियों की छवि खराब करना सभी दलों की प्राथमिकता रहा है। फेक न्यूज का जो खेल राजनीतिक लाभ के लिए होता है उसकी तरफ अमूमन लोगों की नज़र नहीं जाती। अमूमन हम मानकर चलते हैं कि फेक न्यूज का चलन इंटरनेट के साथ शुरू हुआ है। यह एक भ्रम है। दरअसल युद्ध के दौरान और आम हालात में भी फेक न्यूज यानी अफवाहों के माध्यम से सŸा के पक्ष में या उसके विरोध में माहौल बनाने की चलन सभी समाजों में रहा है। भारतीय समाज भी इसका अपवाद नहीं रहा है। उदाहरण के लिए हम महाभारत के युद्ध में अश्वस्थामा की मृत्यु की घोषणा को देख सके हैं। एक हाथी जिसका नाम भी अश्वस्थामा था मार गिराने के बाद इस तरह घोषणा करना जैस गुरू द्रोणाचार्य का पुत्र अश्वस्थामा मारा गया भारतीय आख्यानों में पहली फेक न्यूज कहा जाएगा। पर यदि इसे केवल एक मिथकीय कथानक भी मान लिया जाए तब भी हम पंचतंत्र की उस कथा को नहीं नकार सकते जिसमें चार ठग मिलकर एक ब्राह्मण से उसका बछड़ा ठग लेते हैं। वह चारों बारी-बारी से उसे अलग-अलग जगहों पर बछड़े को कभी गधा तो कभी कोई और जानवर बताकर उसे इतना डरा देते हैं कि वह बछड़ा फेंक कर भाग जाता है। उस कथा की शिक्षा यही थी कि यदि कोई झूठ बार-बार दोहराया जाए तो वह सत्य मान लिया जाता है। राजनीति में और खासकर चुनाव के दौरान ऐसा अक्सर किया जाता है। आज सोशल मीडिया पर यही हो रहा है। ऐसी-ऐसी जानकारियां प्रसारित की जाती हैं जिनका कोई सिर-पैर नहीं होता। विडम्बना यह है कि ऐसी खबरों का स्रोत ज्ञात कर पाना आसान नहीं होता और न ही उनके खिलाफ कोई कार्रवाई कर पाना आसान होता है। जिस इंटरनेट को हमने ज्ञान और सूचना के विस्तार का माध्यम माना था वही आज अज्ञानता के विस्तार का माध्यम बन गया है। सरकारें भी इस तरह की खबरों के प्रति अक्सर उदासीन रहती हैं क्योंकि बहुत सी खबरें तो उसके ही हित में होती हैं। जैसे पिछले दिनों यह खबर फोटो के साथ वायरल हुई कि प्रियंका वाड्रा ने इंदिरा गांधी की तरह दिखने के लिए लंदन में प्लास्टिक सर्जनी करायी है। खबर के साथ उनका आज का और एक पुराना फोटो भी दिया गया। अब इस तरह की फेक न्यूज को रोकने में भला सरकार की रूचि क्योंकर होती। कांग्रेस ने अच्छा हुआ इस खबर को तूल नहीं दिया और यह अपनी मौत मर गयी।

दिक्कत यह है कि अक्सर सोशल मीडिया पर जो भ्रामक या गलत सूचनाएं प्रसारित होती हैं न तो उनके स्रोत का पता होता है और न ही कि उन्हें कौन आगे बढ़ा रहा है। गलत जानकारी देकर सोशल मीडिया पर एकाउंट बना लेना कोई मुश्किल नहीं है। जिस देश में दूसरे देश से आये घुसपैठियों तक के वोटर कार्ड  ही नहीं, पासपोर्ट तक बनने की खबरें सामने आती हों वहां सोशल मीडिया के दुरूपयोग को कैसे रोका जा सकेगा। यह भी कि जब आतंकवादियों द्वारा सोशल मीडिया के उपयोग को नहीं रोका जा सकता तो राजनीतिक दलों और उनके पर्दे के पीछे काम करने वाले कारिंदों को आप कैसे रोक पाएंगे?

भारतीय संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार अनुच्छेद 19 (1) (अ) के खिलाफ युक्तियुक्त निर्बंधन लगाने के कुल आठ आधार अनुच्छेद 19 (2) में वर्णित हैं जिनके आधार पर मीडिया को नियंत्रित करने के लिए करीब तीन दर्जन कानून बनाये गये हैं। एक दशक पूर्व तक देश में इन कानूनों को लेकर कोई सवाल खड़ा नहीं किया जाता था। उस समय तक मीडिया में अखबार, रेडियो और टीवी ही थे। इन तीनों माध्यमों में खबरों की विश्वसनीयता को लेकर बहुत संदेह नहीं होता था। यदि कोई गलत खबर प्रसारित हो जाती थी तो उसके खिलाफ कार्रवाई करना आसान था क्योंकि गलत खबर देने वाले की पहचान संभव थी। परंतु सोशल मीडिया पर तो यह संभव ही नहीं है। इस स्थिति का सामना पिछले ही साल देश ने किया जब दलितों के भारत बंद के दौरान आरक्षण समाप्त करने की, किसी दलित की मौत की और हनुमान प्रतिमा तोड़ने की फेक न्यूज ने समाज में तनाव उत्पन्न कर दिया था और कई जगह हिंसा हुई। इसी प्रकार मॉब लांचिंग की घटनाओं में भी देखने में आया कि व्हाटस्एप पर किसी के गौ तस्कर होने या बच्चा चोर होने की खबर फैलते ही लोगों ने निर्दोष लोगों की हत्या कर दी। इस तरह की खबरों के पीछे कौन लोग थे, यह आज तक ज्ञात नहीं हो सका है। ऐसे में राजनीतिक दलों को रोकने में चुनाव आयोग सफल हो पाएगा, इसकी आशा कम ही है।

चुनाव में समस्या सोशल मीडिया के प्रयोग को लेकर राजनीतिक दलों पर समय-सीमा का नियंत्रण लागू करना ही नहीं है, असल चुनौती है उसके दुरूपयोग को रोकना होना चाहिए। सोशल मीडिया मंचों ने जो आचार संहिता बनायी है उसमें फेसबुक ने अपने मंच व्हाटस्एप पर नियंत्रण को लेकर कोई प्रतिबद्धता नहीं दिखाई है जबकि उसका दायरा फेसबुक से भी अधिक है। इसके अलावा बहुत से ऐसे नये मंच हैं टिकटॉक, हैलो टेलीग्राम आदि जो इस आचार संहिता से बाहर हैं।

इसके साथ यदि कोई सोशल साइट किसी आपत्तिजनक सामग्री को हटाता नहीं है और उस अकाउंट के संचालक के खिलाफ कार्रवाई नहीं करता है तो सोशल साइट पर जुर्माने का या किसी तरह की कार्रवाई का कोई प्रावधान नहीं है। सोशल साइटों ने खुद इस बात को स्वीकार किया है कि उनके मंच पर उपयोगकर्ता को ऐसी सामग्री पोस्ट करने की अनुमति होती है जिसका वह न तो लेखक है और न ही प्रकाशक। यानी कि कोई भी अकाउंट होल्डर अपने पेज पर किसी दूसरे स्रोत से सामग्री लेकर पोस्ट कर सकता है। ऐसी सामग्री अक्सर आधारहीन होती है और लोगों को गलत रास्ते पर ले जाने का काम करती है। ऐसे में राजनीतिक दलों के लिए यह एक मजबूत आधार बन जाएगा फैक अकाउंट से समय सीमा बीतने के बाद भी प्रचार करने का। यह काम वह अपने छद्म कार्यकर्ताओं के माध्यम से कर सकते हैं। साथ ही वह गलत खबरों को अप्रत्यक्ष माध्यमों से प्रसारित करवा कर राजनीतिक लाभ उठाने का प्रयास कर सकते हैं।

Follow Us