बिगड़ते सियासी बोल

बीबीसीखबर, संपादकीयUpdated 28-04-2019
बिगड़ते

 डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज

भारतीय जीवन से किस तरह मर्यादा और शालीनता बेदख़ल होती जा रही है, इसका प्रमाण हैं वर्तमान लोकसभा चुनाव। बिगड़ते सियासी बोलों के बीच एक तरफ चुनाव आयोग शांति और सदभाव के साथ चुनाव सम्पन्न कराने की कोशिश कर रहा है तो दूसरी तरफ हमारे नेताओं की कोशिश है कि सार्वजनिक जीवन से शालीनता को बेदख़ल कर दिया जाए। चुनाव के दौरान पार्टी नेताओं का एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप कोई नई बात नहीं है। परंतु आरोप-प्रत्यारोप में भी एक शालीनता होती थी। 1980 की एक घटना है। इंदौर में मालवा मिल चौराहे पर अटल बिहारी वाजपेयी की सभा थी। उनका भाषण अभी शुरू ही हुआ था कि भीड़ में से किसी ने ऐसा कुछ कहा जो आपत्तिजनक था। अटलजी ने तत्काल उसे डाँटते हुए कहा, ’मैं कमर के नीचे वार नहीं करता।आज के नेताओं से इस तरह के आचरण की उम्मीद नहीं की जा सकती। ऐसा नहीं है कि आज मर्यादा में रहने-बोलने वाले नेता नहीं हैं परंतु उनकी संख्या या तो इतनी कम हो गयी है कि उनकी आवाज़ सामने आ ही नहीं पाती या फिर अब उनके लिए राजनीति में कोई जगह नहीं बची है। आज सभी पार्टियों में ऐसे नेताओं को आगे लाया जा रहा है जिन्हें हम फायर ब्रांड नेताकहते हैं यानी जो आग उगलते हैं और जन-मानस में आग लगा देते हैं। निर्वाचन आयोग चुनाव के दौरान आचार संहिता के तहत ऐसे बयान देने पर प्रतिबंध लगाता है जिनमें किसी व्यक्ति, जाति या समुदास की अवमानना की गयी हो या जो लोगों में जाति, धर्म, भाषा आदि के आधार पर वैमनस्य उत्पन्न करता हो। पर हाल तक जिस तरह के बयान आते रहे हैं उन्हें देखते हुए लगता नहीं है कि नेताओं पर आचार संहिता का कोई असर होता है। निर्वाचन आयोग के अनुसार विगत 16 अप्रैल तक आचार संहिता उल्लंघन के कुछ 372 मामले सामने आ चुके थे। उसके बाद से अब तक इन मामलों की संख्या कितनी हो गयी होगी, कहा नहीं जा सकता। आचार संहिता उल्लंघन के सबसे ज्यादा 104 मामले उत्तर प्रदेश के हैं। इनमें बिगड़े बोलों के मामलों के साथ ही अन्य मामले भी हैं जिनमें प्रचार आदि की अनियमितताएँ शामिल हैं। पर इसके साथ ही यह भी सत्य है कि बिगड़े सियासी बोलों के बहुत से मामले निर्वाचन आयोग की जानकारी तक में नहीं आ पाते।

इन दिनों चुनावों में नेता जिस तरह के बयान दे रहे हैं, वह देखा जाए तो कोई नई बात नहीं है। पिछले कुछ सालों में टीवी पर होने वाली बहसों में विभिन्न दलों के प्रतिनिधि एक दूसरे के साथ अभद्र भाषा का प्रयोग करते रहे हैं, यहाँ तक कि कई बार मारपीट तक पर उतरते रहे हैं। यह सब देखने के बाद कई बार सार्वजनिक स्तर पर नेताओं के व्यवहार को लेकर प्रश्न किये जाते रहे हैं। वैसे पिछले कुछ सालों में लगभग सभी दलों के नेता अपने भाषणों में लोगों के मन मे ज़हर घोलने का ही काम करते रहे हैं। और ऐसा चुनावों के दौरान भी होता रहा है। पर इस बार पहली बार हुआ है कि चुनाव आयोग के साथ ही सुप्रीम कोर्ट को भी इस मामले में क़दम उठाना पड़ा है।

सपा नेता आज़म खान अपने विवादास्पद बयानों के लिए पहले से जाने जाते हैं। जया प्रदा जिन दिनों सपा में थीं उन दिनों भी उन्होंने उन्हें लेकर आपत्तिजनक बयान दिया था। पर इस बार उन्होंने जो कुछ कहा वह अश्लील ही कहा जाएगा। उनके बेटे ने भी अपने पिता जैसा ही बयान दिया। इस बीच उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और बसपा प्रमुख अपने बयानों के कारण प्रचार से प्रतिबंधित किये गए तो राहुल गाँधी को बकायदा सुप्रीम कोर्ट में माफ़ी माँगनी पड़ी। महाराष्ट्र के एक नेता ने तो यहाँ तक कह दिया कि भाड़ में गया कानून, आचार संहिता को भी हम देख लेंगे।

सार्वजनिक जीवन में शुचिता का ऐसा क्षरण पहले कभी देखने को नहीं मिला। यह सिर्फ़ गलत बोलने का मामला नहीं है, और न ही इससे यह कहकर बचा जा सकता है कि ज़ुबान फिसल गई थी। एक -दूसरे पर चारित्रिक टिप्पणियाँ, लोगों की भावनाओं को भड़काने के लिए उत्तेजक भाषणबाजी, सामने वाले की बात पर भड़कर गाली-गलौज पर उतर आना, सामने वाले पर शारीरिक हमला करना या करने का प्रयास करना बदलते राजनीतिक चरित्र का प्रमाण है।

कहते हैं, मुँह से निकला हुआ शब्द और धनुष से निकला तीर वापस नहीं होता। भले ही नेता अपने शब्दों के लिए माफ़ी माँग लें परन्तु उसके कारण जो नुकसान हो चुका होता है, उसकी भरपाई नहीं हो सकती। इसका एक दुष्परिणाम यह भी हो रहा है कि अब नेताओं की बातों पर विश्वास करना मुश्किल हो गया है। यह एक तरह से सम्पूर्ण राजनीति के पतन का संकेत है। आज शायद ही कोई ऐसा राजनीतिक दल या नेता हो जो कभी न कभी सत्ता में न रहा हो, परन्तु उनमें से शायद ही किसी को अपनी ही कही बातें याद रहती हों। यहाँ तक कि उन्हें अपनी ही घोषणाएँ और वादे याद नहीं रहते।

समस्या सिर्फ बदज़ुबानी नहीं है। समस्या यह है कि राजनीतिक दलों व नेताओं की घोषणाएँ, उनके वादे, वैचारिक प्रतिबद्धताएँ, नीतियाँ और वैचारिक जुड़ाव आज केवल औपचारिकता रह गए हैं, बल्कि कहना चाहिए कि स्वार्थ के खेल रह गए हैं। कल तक जिसकी जय-जयकार कर रहे थे, आज उसे गालियाँ देने में कोई संकोच नहीं होता। कल के दुश्मन आज दोस्त हैं, और जो दोस्त थे वो दुश्मन हैं। ऐसे नेताओं के लिए कुछ भी कह देना आसान है। इसीलिए चुनाव के दौर में उनके बोल बिगड़ते जा रहे हैं।

आज स्थिति यह हो गई है कि नेताओं के इन बिगड़ते बोलों के कारण लोगों में उनकी बातों को लेकर गम्भीरता कम होती जा रही है। राजनीतिक दलों की घोषणाओं पर उन्हें यक़ीन नहीं रह गया है। यह ठीक है कि मतदान का प्रतिशत बढ़ रहा है परंतु उसके साथ ही लोगों में उदासीनता और अविश्वास भी बढ़ रहा है। फिलहाल कोई ऐसा राजनीतिक दल या नेता ऐसा नहीं है जो जनता के विश्वास को बचाने या बनाने में यक़ीन करता दिखता हो।

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