जीवन में सार्थक प्रेम की पराकाष्ठा

बीबीसीखबर, धर्मUpdated 03-05-2019
जीवन

 बीबीसी खबर

उत्तर प्रदेश के बरेली में स्थित श्री त्रिवटी नाथ मंदिर प्रांगण मे चल रही कथा ज्ञान यज्ञ के तीसरे दिवस की कथा में कता ऋषि श्री उमाशंकर व्यास जी ने बताया कि यह संसार ही एक प्रकार से शत्रु है इसमें रहने वाले दुर्गुण – दुर्विचार है वे ही हमारे विरूद्ध चल रहे है। उन्ही पर हमें विजय प्राप्त करनी है। उसके लिए जीवन में धैर्य रूपी रथ की अवश्यकता है। जिन पर बैठ कर उन पर विजय प्राप्त की जा सकती है। जीवन में कितना भी सुदृण कवच आप पहन लीजिए उसको भी भेदा जा सकता है। किन्तु श्री राम ने कहा जिसके जीवन में गुरू के प्रति सर्मपण भावना है उसको परास्त करना अंसम्भव है।   

           महा अजय संसार रिपु, जीति सकइ सो बीर।

             जाके अस हथ होइ द्रण, सुनहु सखा मतिधीर।।                                                       

महाराज मनु के मन में पुत्र के प्रति राग है क्यों कि पुत्र आज्ञाकारी है पत्नी मनोनुकूल है। इसीलिए वैराग्य नही हो पा रहा है। बहुधा देखा जाता है कि प्रतिकूल परिस्थितियों में वैराग्य की भावना आ जाती है अनुकूलता जीवन में राग बढ़ाती हैं। मनु ने सोचा जब मेरे जीवन में वैराग्य नही हैं तो व्यर्थ में वैराग्य लाने की चेष्टा में नही पड़ूगा। यदि भगवान को ही पुत्र बना लिया जाए तो भगवान की प्राप्ति भी हो जाएगी तथा राग की सार्थकता भी। महराज मनु ने भगवान से यह मांगा कि आप मेरे पुत्र ही बने। अपितु एक घोर सांसारिक कालि में जैसा पुत्र के प्रति प्रेम होता हैं वैसा ही राग मुझे आप के प्रति हो। सतरुपा जी ने भगवान से पुत्र बनने के साथ साथ ज्ञान भी मांगा कि मुझे आप के ईश्वरत्व का भान रहे किन्तु मनु का अभिप्राय हैं कि जब ईश्वर ही पुत्र बन जाए तब राग की पराकाष्ठा होनी चाहिए।

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