सदगुणो को अमर बनाने के लिए जिस अमृत की आवश्यकता है वह हैं प्रेम

बीबीसीखबर, धर्मUpdated 06-05-2019
सदगुणो

 बीबीसी खबर; बरेली

श्री त्रिवटी नाथ मंदिर प्रागंण में चल रही श्री राम कथा ज्ञान यज्ञ में कथा ऋषि श्री उमाशंकर व्यास जी ने बताय़ा कि हमारे पुराणों में ऐसी कथा आती है कि देवता तथा दैत्यों मे जब युद्ध होता हैं तो दैत्य विजयी होते हैं तथा देवता परास्त होते हैं तब भगवान ने ये कहा कि देवता अमृत पीकर जब अमर हो जाएगें तब दैत्यों पर विजय प्राप्त हो सकती हैं और अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन करना पड़ेगा। ठीक उसी प्रकार संसार में भी सदगुण ही देवता और दुर्गुण ही दैत्य। व्यवहार में भी सदगुण ही हारते हैं और दुर्गुण सफल हो जाते हैं और इन सदगुणो को अमर बनाने के लिए जिस अमृत की आवश्यकता है वह प्रेम का अमृत हैं। सीधा सा तात्पर्य हैं कि कितना भी दुर्गुणी व्यक्ति क्यों न हो जब तक भगवत प्रेम का अमृत नही पीता तब तक उसके गुण स्थाई नही होते और वह प्रेम की अमृत श्री भरत के ह्रदय रूपी समुद्र में छिपा हैं। श्री राम ने उस प्रेम अमृत को प्रगट करने के लिए चौदह वर्ष के वियोग का आश्रय लिया।

श्री व्यास जी कहते हैं कि निषाद राज ने श्री राम से कहा कि मै आपके साथ रहकर के मार्ग दिखाऊगां किन्तु श्री राम ने उनके समक्ष ही श्री महर्षि से मार्ग पूछा मानो श्री राम का अभिप्राय है कि मित्र तुम जितने महान मार्गदर्शक हो उतना ही महान यात्री भी होना चाहिए उतना विशिष्ट यात्री भरत जी हैं इसलिए श्री भरत जी निषाद राज को अपना मार्ग दर्शक बनाते हैं। आगे-आगे श्री राम जाते हैं बाद मे श्री भरत इसका कारण यह हैं कि जब कोई विशिष्ट आने वाला होता हैं तो आगे-आगे प्रचार किया जाता है इसका साधा अभिप्राय यह है कि भगवान का भी ईष्ट भक्त हैं भगवान तो स्वयं को भक्त का एक सेवक मात्र मानते हैं।

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