श्री भरत का उद्देश्य़ प्रभु को सुख तथा आनन्द की प्राप्ति कराना है

बीबीसीखबर, धर्मUpdated 07-05-2019
श्री

 बीबीसी खबर ;बरेली

श्री त्रवटी नाथ मंदिर प्रांगण में चल रही कथा मे कथा ऋषि श्री उमाशंकर व्यास जी ने बताया कि यद्पि श्री भरत श्री राम को लौटाने आए हैं और श्री राम ने कह भी दिया कि तुम जो कहोगे मै वो करुगां किन्तु प्रसन्न मन से संकोच छोड़कर कहना संकोच छोड़कर कहने के पीछे श्री राम का अभिप्राय़ था कि भरत अत्यंत शीलवान हैं और शीलवान व्यक्ति सबकुछ छोड़ सकता हैं परन्तु शील नही छोड़ सकता श्री राम के मुख से यह बात सुनकर कि तुम कहो तो मै लौट चलूँ। सारे अयोध्या वासी प्रसन्न हो गए। देवता लोग मुर्छित होने लगे। अब तो सब कुछ नष्ट हो गया। श्री भरत कहेगें और श्री राम लौट जाएगें। देवताओं ने गुरु बृहस्पति से कहा कि अब कोई उपाय आप कीजिए जिससे भरत की बुद्धि फिर जाए। देव गुरु बृहस्पति हसंने लगे और का कि तुम लोग चिन्ता मत करो श्री भरत तो श्री राम की छाया हैं और छाया शब्द में ही सम्पूर्ण समर्पण का सार छिपा हुआ हैं। व्यक्ति जो करता है छाया भी वही करती हुई दिखाई देती हैं किन्तु व्यक्ति की तृप्ति के लिए वाह्य वस्तुओं की आवश्यकता होती हैं परन्तु व्यक्ति के तृप्त होते ही छाया भी तृप्त हो जाती है। व्यक्ति में मन, बुद्धि,चित्त अंहकार सब होता है। छाया इन सब से मुक्त है। बृहस्पति जी का अभिप्राय था कि श्री भरत के मुख से वही वाक्य निकलेगा जो श्री राम चाहेंगे अन्त में भरत ने यही कहा प्रभु

        जेहि विधि प्रभु, प्रसन्न मन होई। करूणा सागर कीजिए सोई।।

 

कथा ऋषि कहते हैं कि श्री भरत की भावना यह थी कि तिनके की सय्या पर भी उनको यह सोच कर आंनद की निद्रा आती है कि मै पिता की आज्ञा का पालन कर रहा हूँ किन्तु यदि मै इनको लौटा ले गया तो राजमहल की सुकोमल सय्या पर भी तड़पते रहेंगे नींद नही आएगी ये सोचकर के हाय-हाय मैं पिता की अंतिम आज्ञा का पालन नही कर सका सीधा सा अभिप्राय है  कि श्री भरत का उद्देश्य़ प्रभु को सुख तथा आनन्द की प्राप्ति कराना है ना की अपने अंहकार की तृप्ति।

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