परम प्रिय उत्सव चुनाव

बीबीसीखबर, संपादकीयUpdated 09-05-2019
परम

 डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज

उत्सवधर्मी है हमारा देश। जन्म से लेकर मृत्यु तक उत्सव ही उत्सव। ऐसे मुल्क में चुनाव भला क्यों कर उत्सव नहीं होता। आये दिन कहीं न कहीं चुनाव होते ही रहते हैं। कभी लोकसभा के तो कभी विधानसभा के, और कुछ नहीं तो नगर पालिका - नगर निगम और पंचायत के चुनाव तो हैं ही। एक समय था कि चुनाव उत्सव में वो धूम-धड़ाका होता था कि लोग होली-दिवाली को भूल जाते थे। अब पहले सी बात तो नहीं रही फिर भी रंग अब भी जमता है। चुनाव आयोग की निगाह से बचकर माननीय नेतागण ठीक उसी प्रकार अपनी कर गुजरते हैं जैसे मास्टरजी की नजर बचाकर बच्चे नकल कर लेते हैं। इस बार जिस तरह से चुनाव की शुरूआत हुई उसे देखकर दिल हाय.... हाय..... करने लगा था। क्या हो गया इस मुल्क को। क्या इसी तरह चुनाव होते हैं। कहाँ गया वह उत्सवी माहौल। किसकी नजर लग गयी चुनाव को।

चुनाव की घोषणा के पहले ही यार लोगों ने तैयारियाँ शुरू कर दी थीं। चुनाव को वीरों का वसंत बनने से तो चुनाव आयोग ने पहले ही रोक दिया था। बम और तमंचे बनाने वाले कुटीर उद्योग बरबाद हो चुके हैं। चुनाव आयोग ने प्रचार के बिगड़ैल सांड को भी नाथने की व्यवस्था कर रखी है। हाय! कितने बुरे दिन आ गये हैं इस देश के। एक चुनाव ही तो बचे थे जो सार्वजनिक जीवन को थोड़ा रंगीन बना देते थे। अब यह भी नहीं हो सकता।

अब भला चुनाव आयोग को कौन समझाए कि जान हथेली पर लेकर वोट डाल आना जो गौरव भाव जागृत करता है वह संगीनों के साये में कैसे जाग सकता है। वोट डालने का मजा तो उन दिनों आता था जब हम लाठियों-बंदूकों की सारी बाधाएँ पार करके वोट देकर सकुशल वापस आ जाते थे और किसी को पता भी नहीं चलता था। उससे भी अधिक मजा तब आता था जब हमें खुद पता नहीं चल पाता था कि हमारा वोट तो पहले ही पड़ चुका है। जब तक बाबू देवकी नंदन खत्री के तिलिस्म का मजा न आए तब तक क्या खाक चुनाव हुए।

और फिर वह चुनाव ही क्या जिसमें धूम-धड़ाका न हो। आजकल के चुनाव से अधिक हंगामा तो हम कॉलेज के चुनाव में कर लेते थे। न लाउडस्पीकर की आवाज है न ढोलक की थाप है। गली-गली में शोर नहीं है जैसे कोई चोर नहीं है। अब यह भी क्या बात हुई कि आप दीवारों पर चुनाव प्रचार नहीं लिखवा सकते। अरे भाई इसी बहाने कितनी ही दीवारों की पुताई हो जाती थी। प्रत्याशी के समर्थक पोस्टर-बैनर नहीं लगा सकते। पार्टी खर्च का हिसाब नहीं दे सकी तो उसे प्रत्याशी का खर्च माना जाएगा। और तो और, अब आप 50 हजार रूपये से अधिक लेकर घूम नहीं सकते, चाहे व्यापारी हो, आम आदमी हो या नेता। यह भी कोई बात हुई।

पहले कितना मजा आता था। हर तरफ दीवारों पर रंग-बिरंगे नारे लिखे दिखते थे। वातावरण में नारे गूँजते रहते थे। आज उसकी सभा तो कल उसकी सभा। बेरोजगारों को रोजगार मिल जाता था। मुफ्त की खाते थे, मुफ्त की पीते थे और जोर-जोर से आवाज लगाते थे- हमारा नेता कैसा हो.......। इससे उनके फेफड़े खुल जाते थे। दमा और हार्ट अटैक की आशंका कम हो जाती थी। स्वास्थ्य सेवाओं में क्षेत्र में चुनाव के इस योगदान को चुनाव आयोग ने समाप्त कर दिया।

अब तो उम्मीदवार भी अपने दो नम्बरी भाइयों के हाथ जोड़ते हैं कि हमारे समर्थन में पोस्टर-बैनर मत लगाना वर्ना चुनाव आयोग चचा नाराज हो जाएगा। ब्लैक को व्हाइट करने का मौका भी हाथ से जाता रहा। कुछ साहसी लोगों ने कोशिश की तो पकड़े गये। आजकल तो दुकानदार भी नकद की जगह उधार माल देने लगे हैं। नकद लेकर जाएंगे कहाँ, कितना हिसाब देंगे। लालाजी अपनी कार प्रचार के लिए देने को लालायित हैं पर प्रत्याशी हाथ जोड़ कर कहता है- ना जी, हम तो जनता के सेवक हैं, पैदल ही घूमेंगे। देसी तमंचों कौड़ी के दो हो गये हैं। दारू की भठ्ठियाँ सुबक रही हैं। लठैत सब्जी-पूड़ी पर भी सेवा देने को तैयार हैं पर कोई लेने वाला नहीं मिल रहा। प्रचारकों ने भी अपने रेट कम कर दिये हैं। चुनाव के बाजार में ऐसी मंदी आयी है कि जनता अपने क्षेत्र के प्रत्याशियों को साक्षात देखने को तरस गयी है। कितने प्रत्याशी हैं, कौन-कौन प्रत्याशी हैं, कुछ पता नहीं चलता। प्रत्याशियों को भी पता नहीं होगा कि उनके चुनाव क्षेत्र में कौन-कौन शहर, गाँव, मोहल्ले हैं।

चुनाव कर्मचारियों की मुसीबत भी बढ़ गयी है। अब दिन भर बैठकर मतदान कराना होगा। वो भी क्या दिन थे जब पार्टी वाले आते थे और हलवा-पूरी देकर कर्मचारियों को एक कोने में बैठा देते थे, और शुरू हो जाता था मतदान। अब तो चुनाव की रंगीनियाँ सिर्फ यादों में रह जाएँगी। आज की पीढ़ी को तो वैसे भी पता नहीं कि पहले चुनाव कैसे होते थे। पुरानी फिल्मों से कुछ ज्ञान मिल पाए तो अलग बात है। अब न तलवारों की चमक है और न बमों की धमक।

ऐसे में ले-देकर बयानबाजी से कुछ उम्मीद बची हुई थी पर उस पर भी आयोग ने कैंची चला दी है। अब यह भी कोई बात हुई कि आप कुछ कहें भी नहीं। कैसे-कैसे मजेदार बयान आ रहे थे। जनता का थोड़ा मनोरंजन हो रहा था। कोई किसी का पायजामा खींच रहा था तो कोई किसी की धोती खोल रहा था। गली-गली में शोर है.....या चोर-चोर मौसेरे भाई .....जैसे नारे अब सुनाई नहीं देते। धर्म और जात-पात की गठरी बांध कर रख देनी पड़ी है। अब किस आधार पर वोट मांगें। आखिर टीवी और सोशल मीडिया के सहारे कैसे नैया पार होगी, क्या कोई नहीं जो चुनाव को नजर का टीका लगा कर बचा सके।

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