दस प्रतिशत बनाम नब्बे प्रतिशत, परीक्षा परिणाम जीवन का सर्वस्व नहीं

बीबीसीखबर, संपादकीयUpdated 14-05-2019
दस

 डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज

पिछले दिनों सोशल मीडिया पर ऐसी बहुत सारी पोस्ट देखने को मिलीं जिनमें अभिभावकों द्वारा अपने बच्चों के बोर्ड परीक्षा में 90 प्रतिशत से अधिक अंक पाने पर खुशी प्रकट की गयी थी। यह खुशी की बात थी भी। बच्चों की कामयाबी माता-पिता ही नहीं अन्य रिश्तेदारों के लिए भी खुशी का कारण होती है। एक तरफ यह खुशी की अभिव्यक्ति थी तो दूसरी तरफ कुछ ऐसी खबरें भी सामने आयीं जिनके अनुसार कुछ बच्चों ने परीक्षा में अपेक्षित नम्बर न आने पर आत्महत्या कर ली। इस तरह की घटनाएँ कम थीं पर जो भी थीं वह एक अलग तरह की चिंता का विषय होनी चाहिएँ। चिंता इसलिए भी होनी चाहिए कि परीक्षा तंत्र और परिणामों ने दस प्रतिशत बनाम नब्बे प्रतिशत की स्थिति खड़ी कर दी है। दस प्रतिशत वह विद्यार्थी जिन्होंने 90 प्रतिशत या उससे अधिक अंक प्राप्त किये हैं और 90 प्रतिशत वह विद्यार्थी जिन्हें 90 फीसद से कम अंक मिले हैं। संसाधनों के असमान वितरण, अवसरों की अनुपलब्धता और निजी क्षमता के अंतर ने 10 प्रतिशत और 90 प्रतिशत के बीच ऐसी प्रतियोगिता को शुरू कर दिया है जो सामाजिक असमानता ही नहीं असामंजस्य को भी बढ़ाने का काम कर रही है।

यह बहुत पुरानी बात नहीं हुई है। तीन-चार दशक पहले तक स्थिति यह थी कि यदि किसी विद्यार्थी को प्रथम श्रेणी यानी 60 प्रतिशत अंक भी मिल जाते थे तो एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। जिन्हें 75 प्रतिशत अंक मिलते थे उन्हें अधिक प्रतिभावान मान लिया जाता था परंतु ऐसे विद्यार्थियों की संख्या बहुत नहीं होती थी। 50 प्रतिशत तक अंक पाने वाले विद्यार्थियों को भी प्रतिभावान माना जाता था और जीवन में उनके लिए रोजगार सहित अन्य क्षेत्रों में पर्याप्त अवसर होते थे। जिन्हें अच्छे अंक मिलते थे वह सम्मान के हकदार होते थे परंतु जिन्हें कम अंक मिलते थे वह उपेक्षा या निंदा के पात्र नहीं बनते थे। पर आज स्थिति कुछ अलग है। सब कुछ हांसिल करने की तो मानसिकता आज पूरी दुनिया में लोगों के दिमाग में भर दी गयी है, यह उसी का नतीजा है कि आज हम बच्चों से सौ प्रतिशत अंक लाने की आशा करने लगे हैं। और इसी से हमने अपने ही बच्चों को एक ऐसी स्थिति में पहुँचा दिया है जहाँ उनके लिए जीवन एक तरह से नंबर गेम बनकर रह गया है।

सुखी जीवन और सफल जीवन के पैमाने अलग-अलग होते हैं परंतु हमने उन्हें घालमेल कर एक कर दिया है। हमने सफलता को ही सुख मान लिया है। यही कारण है कि हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे जीवन के हर क्षेत्र में सफल हों। वह कितने सुखी रह पाते हैं यह हमारे लिए कोई मसला ही नहीं है। हमारे लिए तो बस उनकी सफलता ही सबकुछ है। इस सफलता के लिए चाहे जो कीमत देनी पड़े। यह एक गंभीर संकट है। नंबरों की दौड़ हमारा सामाजिक चरित्र बन गयी है। शिक्षा से लेकर पेशेवर जीवन में सफल और सबसे आगे रहने की आकांक्षा ने समाज को दो खानों में विभाजित कर दिया है। एक वह जो सफल हैं और दूसरे वह जो असफल हैं। सफलता का पैमाना उच्च है और शीर्ष से थोड़ा भी नीचे होना असफलता है।

बोर्ड परीक्षाओं में ही नहीं, अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के साथ ही रोजगार व अन्य मामलों में हम पाते हैं कि केवल दस प्रतिशत लोग ही शीर्ष स्थान पर होते हैं। शिक्षा के मामले में इस शीर्ष स्थान को पाने यानी अधिकतम अंक पाने के लिए हमने परीक्षा व्यवस्था को इस तरह का बना दिया है जिसमें सौ प्रतिशत तक अंक पाने की संभावना रहे। इसके लिए बकायदा तैयारी करायी जाती है। स्कूल के अलावा ट्यूटर व कोचिंग सेंटरों में बच्चों को तैयार किया जाता है। उन्हें प्रश्नपत्र हल करने के वह तरीके सिखाये जाते हैं जिससे अधिकतम अंक प्राप्त हो सकें। यही कारण है कि कुछ बच्चों को कई विषयों में सौ में से सौ नंबर मिले। यह सौ प्रतिशत सफलता के दावे जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में बढ़ते जा रहे हैं। इसी के साथ सौ प्रतिशत उपयोगिता की मांग भी बढ़ती जा रही है।

अधिकतम सफलता पाने और खुद को सौ प्रतिशत उपयोगी साबित करने की ललक ने हमारे सामाजिक ताने-बाने को जो नुकसान पहुँचाया है, उस पर अलग से विचार करने की जरूरत है। यहाँ हम सिर्फ शिक्षा जगत को देखें तो इस सौ प्रतिशत सफलता की आकांक्षा ने बच्चों ही नहीं, उनके माता-पिता की जीना भी मुश्किल कर दिया है। बच्चे आज के लिए जीना छोड़ रहे हैं, वह भविष्य के लिए, एक सफल भविष्य के लिए जी रहे हैं। सफल भविष्य यानी अच्छा कॉलेज, मेरिट, लाखों का पैकेज। यह मिलता है पर सबको नहीं। दस प्रतिशत से भी कम विद्यार्थी इसे प्राप्त कर पाते हैं। बाकी के 90 प्रतिशत कुछ कम पैकेज का जीवन स्वीकार कर पाते हैं। उनमें भी बड़ी संख्या उन लोगों की होती है जिन्हें औसत पैकेज का जीवन स्वीकार करना पड़ता है। शिक्षा के दौरान ही जीवन का पैकेज भी तय हो जाता है। प्रतिभा की जगह डिग्री अधिक महत्वपूर्ण हो गयी है। और इस डिग्री में भी वह संस्थान अधिक महत्वपूर्ण हो गया है जहाँ से डिग्री ली गयी है। यह तो संभव नहीं की सभी बच्चे ऐसे संस्थानों में पढ़ सकें। आज भी देश की आधी से अधिक आबादी ऐसी है जिसके लिए अपने बच्चों को सामान्य शिक्षा दिला पाना भी संभव नहीं होता। उनके बच्चे तो वैसे भी सफल जीवन की इस दौड़ से पहले ही बाहर होते हैं। शेष आबादी में से भी ऐसे लोगों की संख्या कम ही होती है जो अपने बच्चों को आईआईएम जैसे संस्थानों में पढ़ा सकें। ज्यादातर माता-पिता के लिए बच्चों को लाखों की फीस देकर पढ़ा पाना संभव नहीं होता।

इस तरह हम देखें तो जीवन के शुरूआती दौर यानी बारहवीं तक की शिक्षा के काल में ही हम अपने बच्चों को ऐसी प्रतियोगिता में झौंक देते हैं जो किसी भी तरह से उचित नहीं कही जा सकती। यह इसलिए भी उचित नहीं है कि मानवीय प्रतिभा एक नैसर्गिक स्थिति है। सभी मनुष्यों में एक जैसी क्षमता संभव नहीं है। वह तो केवल मशीन में ही हो सकती है। व्यक्ति मेहनत करके अपनी प्रतिभा को निखार सकता है परंतु एक सीमा तक ही। कोई बच्चा पढ़ने में अधिक होशियार होता है। उसे एक-दो बार पढ़ने के बाद ही समझ में आ जाता है पर बहुत से बच्चों को इसके लिए कई बार प्रयास करने के बाद भी पूरी सफलता नहीं मिलती। क्रिकेट खेलने वालों में अनेक महान खिलाड़ी हुए हैं पर सचिन तेंदुलकर जैसा रिकॉर्डधारी हर कोई नहीं हो सकता। हर बल्लेबाज सचिन जैसा बनने का सपना देखता है पर बन नहीं पाता। उसकी प्रतिभा और सचिन की प्रतिभा में जो अंतर है वही उनके बीच अंतर का कारण होता है। ठीक यही बात बच्चों के संदर्भ में भी लागू होती है।

फिल्मों में एक ही समय में काम करने वाले राजेश खन्ना, जीतेंद्र, धर्मेंद्र आदि की लोकप्रियता में कमी न होने के बाद भी उनका स्तर अलग-अलग था और जैसी शोहरत राजेश खन्ना को मिली वैसी और किसी को नहीं मिली जबकि अभिनय की दृष्टि से उनसे कहीं अधिक समर्थ कलाकार उस समय थे। शुरूआती असफलताओं के बाद अमिताभ ने जो कामयाबी प्राप्त की और जिस तरह मैदान से बाहर होने के बाद वापसी कर उन्होंने सार्वकालिक स्वीकृति प्राप्त की उस तक कोई पहुँच पाएगा इसकी संभावना नजर नहीं आती। यह अलग बात है कि अभिनय के मामले में उनसे इक्कीस कलाकार पहले भी थे और आज भी हैं। इससे यह भी साबित होता है कि सफलता कभी भी सामर्थ्य का पर्याय नहीं होती। जिन बच्चों को कम अंक मिलते हैं वह अधिक अंक पाने वालों से कम क्षमतावान नहीं होते, बल्कि हो सकता है उनसे ज्यादा ही हों। इसलिए जरूरत इस बात की है कि यह जो 10 बनाम 90 प्रतिशत की स्थिति हमने पैदा की है उसे खत्म किया जाए। बच्चों के मन में इस भावना को मजबूत करने की जरूरत है कि परीक्षा में प्राप्त अंक जीवन का अंतिम परिणाम नहीं है। यह उनके जीवन का एक पड़ाव है। इस पड़ाव पर मिली सफलता या असफलता उनसे उनके जीवन के जीने का अधिकार नहीं छीन सकती। इसके लिए हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा पद्धति में बदलाव करना चाहिए जिसमें अंकों से अधिक बच्चों की प्रतिभा का, उनके बौद्धिक सामर्थ्य का महत्व हो।

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