बड़बोले विपक्ष की नियति थी हार

बीबीसीखबर, संपादकीयUpdated 03-06-2019
बड़बोले

 डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज

चुनाव होता ही इसलिए है कि उसमें एक हारेगा तो दूसरा जीतेगा। हमारे देश में अब तक हुए चुनावों में किसी के हारने या जीतने पर इतना हंगामा पहले कभी नहीं हुआ जितना इस बार हो रहा है। विपक्ष से लेकर बुद्धिजीवी तक मोदी के नेतृत्व में भाजपा की जीत को लेकर निराश नजर आ रहे हैं। सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव की शुरूआत से ही विपक्ष और उसके समर्थक इस बात को लेकर आश्वस्त थे कि भाजपा का सूपड़ा साफ हो जाएगा और वह लोकसभा में प्रमुख विपक्षी दल के लिए न्यूनतम सीटें 54 भी हांसिल नहीं कर पाएगी। विपक्ष इस बात को लेकर आश्वस्त रहा कि अपने पांच साल के कार्यकाल में मोदी सरकार के कुछ ऐसे निर्णय थे जो नकारात्मक प्रभाव डाल सकते थे। फिर विपक्ष में भी मोदी सरकार को हराने के लिए एकजूटता की बात हो रही थी। कुछ जगह गठबंधन हुए भी परंतु वह बहुत कारगर साबित नहीं हुए। अब जबकि चुनाव हो चुके हैं तब यह बात विपक्ष को स्वीकार करनी होगी कि उसकी हार का कारण उसकी अपनी कमियां हैं। कई हिस्सों में बंटा विपक्ष चुनाव के दौरान अपने-अपने दल के प्रधानमंत्री का दावा करता रहा। वह लगातार मोदी पर व्यक्तिगत हमले करता रहा। बहुत सी जगहों पर वह आपस में ही टकराता रहा। केंद्र में सत्ता में आने के उसके बड़बोलेपन में तो कोई कमी नहीं आयी परंतु जमीनी स्तर पर उसके पास ऐसा कुछ नहीं था जिसे जनता पसंद कर पाती। यहां तक कि उसके कार्यक्रम और घोषणा पत्र भी भाजपा की छाया से मुक्त नहीं हो सके। यही कारण है कि बड़बोलापन विपक्ष को ले डूबा और उसकी स्थिति पहले से भी कमजोर हो गयी। केंद्र में सत्ता में वापसी का दावा कर रही कांग्रेस तो एक बार फिर प्रमुख विपक्षी दल होने की योग्यता पाने से भी चूक गयी। यानी जो स्थिति उसने भाजपा के लिए सोची थी उसमें वह खुद आ गयी।

इस बार चुनाव में शुरू से ही विपक्ष को लग रहा था कि मोदी के नेतृत्व में भाजपा के लिए पिछली सफलता दुहराना संभव नहीं होगा। पिछले कुछ समय से देशभर में ऐसी घटनाएं हुई हैं, गोकशी के नाम पर सामूहिक हिंसा, नोटबंदी का असर, बढ़ती बेरोजगारी, धीमी विकास दर आदि, जिन्हें देखते हुए यह लग रहा था कि भाजपा भले ही सत्ता में आ जाए पर वह पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं कर पाएगी और उसे सहयोगियों के सहारे ही सरकार चलानी होगी। दूसरी तरफ यह भी माना जा रहा था कि विपक्षी दलों के गठबंधनों के कारण भाजपा को हार का सामना करना पड़ेगा और केंद्र में गैर भाजपा सरकार बनेगी। किसकी सरकार बनेगी यह स्पष्ट नहीं था पर इस दावे में कुछ दम नजर आ रहा था तो उसके कुछ कारण थे। परंतु चुनाव परिणामों ने विपक्ष के तमाम दावों को धराशायी कर दिया। चुनावों की घोषणा के बाद से ही सोशल मीडिया पर एक वर्ग लगातार इस बात को स्थापित करने का प्रयास करता रहा कि देश की जनता मोदी राज से परेशान हो चुकी है और परिवर्तन चाहती है। प्रियंका गांधी वाड्रा के राजनीति में प्रवेश और सपा-बसपा गठबंधन के बाद लगने लगा था कि हवा का रूख बदलेगा। खासकर कांग्रेस और उसके समर्थकों को लगता था कि प्रियंका अपनी दादी इंदिरा गांधी जैसा चमत्कार कर देंगी। परंतु चुनाव परिणामों ने बता दिया है कि बड़बोले विपक्ष की यही नियति थी। एक बार फिर उसे न केवल हार का सामना करना पड़ा बल्कि जिस मोदी को वह हटाने का सपना देख रहे थे वह अधिक ताकतवर होकर सामने आये हैं। राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति में अपनी अलग पहचान रखने वाले क्षेत्रीय नेता चंद्र बाबू नायडू, ममता बनर्जी, सपा व बसपा, अरविंद केजरीवाल, लालू प्रसाद यादव आदि सब दावे तो खूब करते रहे परंतु अपनी साख भी बचा पाने में नाकाम रहे।

चुनाव परिणामों के बाद लगातार उनका विश्लेषण हो रहा है। कुछ लोगों के लिए यह चुनाव हिंदुत्व बनाम गैर हिंदुत्व का था तो कुछ के अनुसार चुनाव हुआ ही नहीं क्योंकि मोदी सरकार ने ईवीएम में गड़बड़ी की है। कई ऐसे विश्लेषण भी सामने आ रहे हैं जिनमें कहा जा रहा है कि यह मोदी की जीत उतनी नहीं है जितनी विपक्ष की हार जो एकजूट न हो सका। कुछ लोगों के अनुसार विपक्ष बंटा हुआ और कमजोर था इसलिए वह मोदी के आक्रामक प्रचार का जवाब नहीं दे सका। उग्र हिंदुत्व (भाजपा) और नरम हिंदुत्व (कांग्रेस) की बात भी की जा रही है। पर इस बात की तरफ कोई ध्यान नहीं दे रहा कि इस बार चुनाव एक तो मोदी को हटाने के लिए लड़ा गया और दूसरे यह कि विपक्ष के पास न तो जनता को देने के लिए कोई ठोस कार्यक्रम था और न ही कोई नीति। एक विश्लेषक ने इस बात को उठाया है कि कांग्रेस ने जो जीर्ण-शीर्ण विचारधारा बची हुई थी वह इस चुनाव में पता नहीं कहां गयी। मुझे आश्चर्य होता है यह सुन-पढ़ कर कि कांग्रेस की कोई विचारधारा भी है। एक ऐसी पार्टी जो पूरी तरह एक परिवार की संपत्ति बनी हुई है उसमें विचारधारा की बात एक मजाक के अलावा कुछ नहीं है। राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने की संभावनाओं के बीच कांग्रेस कमेटी की बैठक में शुरू में ही राहुल के नेतृत्व में विश्वास प्रकट करते हुए उनसे अध्यक्ष बने रहने की विनती को यदि विचारधारा माना जा रहा है तो मुझे कुछ नहीं कहना।

इस बार चुनाव में दो बातें प्रमुखता से सामने आयी हैं। एक तो यह कि मोदी की काट के लिए कांग्रेस सहित किसी भी दल के पास कोई ठोस योजना नहीं थी सिवाय इसके कि मोदी को कोसा जाए और भाजपा को केवल हिंदू हितों की रक्षक बताया जाए। दूसरे यह कि विपक्ष ने जो भी कार्यक्रम पेश किये वह कुल मिलाकर मोदी की घोषणाओं की नकल भर थे। तीसरी बात यह कि कांग्रेस यानी राहुल और प्रियंका इस तरह से चुनाव लड़ रहे थे जैसे मोदी लड़ रहे थे। यहां भी कांग्रेस केवल नकल का सहारा ले रही थी। इसके विपरीत मोदी ने अपनी रणनीति में अपनी सरकार के कई कामों को नजरअंदाज कर उन बातों पर अधिक फोकस किया जो जनता को लुभा सकती थीं जैसे सर्जिकल स्ट्राइक, पाकिस्तान को चेतावनी, किसानों को सम्मान, गांवों में बिजली व गैस, सड़क निर्माण, गरीबों को घर, शौचालयों का निर्माण आदि। चौथी बात यह कि विपक्षी दल एक होने की इच्छा तो प्रकट करते रहे परंतु कभी एक हो नहीं पाए। सपा-बसपा ने अपना अलग गठबंधन बना लिया। ममता बनर्जी को कांग्रेस के साथ खड़े होना मंजूर नहीं था। कांग्रेस और आप के बीच दाल गल नहीं पायी। इन हालात में जनता के पास विपक्ष पर विश्वास करने का कोई आधार नहीं बन पाया।

इस चुनाव में एक बात तो बहुत साफ होकर सामने आयी है कि जो दल सरकार में नहीं हैं उनके पास अपना कोई कार्यक्रम तक नहीं होता, विचारधारा तो बहुत दूर की बात है। हालांकि मैं इस बात को नहीं मानता हूं फिर भी यदि मान लिया जाए कि भाजपा की विचारधारा हिंदू राष्ट्र और हिंदुत्व है तो उसके अलावा कोई दल ऐसा नहीं है जिसके पास इस तरह का या इससे अलग कोई विचार हो। वामपंथी दलों के पास वैचारिक आधार है परंतु वह इतने संकीर्ण हो चुके हैं कि वह भाजपा को हराने के लिए किसी भी दल का समर्थन करने को तैयार रहते हैं भले ही वह अपने चरित्र में भाजपा जैसे ही हों। वह अपने विस्तार की बजाय जो विस्तारित है उसका सहारा लेकर आगे बढ़ने का सपना देखते हैं जिसका पूरा होना असंभव है। जब तक वामपंथी दल खुद को वैचारिक धरातल पर लोगों से नहीं जोड़ेंगे और भाजपा को मिटाने के लिए हिंदुओं के मुकाबले में मुसलमानों को महत्व देते हुए उनकी गलत बातों का भी समर्थन करेंगे तब तक उनके लिए भारतीय राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाना संभव नहीं हो सकेगा। जब आप एक धर्म के खिलाफ दूसरे धर्म का समर्थन करते हैं तो आप भी धार्मिक हो जाते हैं। इस तरह धर्मनिरपेक्ष नहीं हुआ जा सकता। धर्मनिरपेक्ष होने के लिए आपको कबीर होना पड़ता है और दोनों तरफ से आहत होने को तैयार रहना होता है।

बहरहाल, बात करें भाजपा की जीत और बाकी सबकी हार की तो इसके लिए खुद विपक्ष ने जमीन तैयार की। कांग्रेस लंबे समय से एक डरपोक पार्टी रही है। उसने तीन तलाक, जीएसटी, महिला आरक्षण जैसे मामलों को हमेशा लटकाये रखा। इसके विपरीत मोदी सरकार ने इन मामलों में साहसिक कदम उठाये। एक समय इंदिरा गांधी ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण जैसा कदम उठाया गया और गरीबी हटाओ का नारा दिया जो काफी असरदार रहे। कांग्रेस के राज में ही देश ने 1991 में आर्थिक उदारीकरण की राह पकड़ी पर आज उसके पास ऐसा एक भी ठोस कार्यक्रम नहीं है जिससे वह मौजूदा सरकार का मुकाबला कर पाती। उŸार प्रदेश में ठीक चुनाव से पहले प्रियंका वाड्रा को मैदान में उतारना चाटुकार कांग्रेसियों के लिए भले ही उत्सव का कारण था परंतु इससे देशभर की जनता में यह संदेश गया कि राहुल गांधी को अपने बल पर चुनाव में जीत का भरोसा नहीं है। यह इससे भी प्रमाणित हो गया कि वह अमेठी के अलावा केरल से भी चुनाव लडे़। भाजपा ने इसे उनका अमेठी में हार के डर से भागने के रूप में प्रचारित किया गया जिसे जनता ने स्वीकार भी कर लिया। कांग्रेस का चुनाव घोषणा पत्र देखें तो ऐसा लगता था जैसे वह मोदी सरकार की नीतियों की भोंड़ी नकल था।

यह जानते हुए भी कि कुछ ही महीनों बाद लोकसभा चुनाव होने वाले हैं, कांग्रेस शासित राज्यों में उसने ऐसा कुछ नहीं किया जिसे देखकर उससे देश के स्तर पर किसी तरह की आशा की जा सके। यही कारण है कि जिन राज्यों में पांच महीने पहले वह सत्ता में आयी थी वहां लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हार गयी। यहां तक कि उसके दिग्गज तक चुनाव हार गये। लंबे समय तक कांग्रेस दलित और मुस्लिम वोटों को आधार बनाकर चुनाव में सफलता प्राप्त करती रही परंतु वह भी अब उसके पक्ष में नहीं रहे। इस बात को जानते हुए राहुल और प्रियंका ने दूसरा खेल खेला। उन्होंने मंदिरों में जाकर, खुद को ब्राहमण बताकर नाराज हिंदू मतदाताओं को लुभाने की कोशिश की परंतु उसमें कामयाबी नहीं मिली।

दूसरे-तीसरे चरण के मतदान के बाद से ही विपक्ष का बड़बोलापन बढ़ गया था। सपा मुखिया अखिलेश यादव ने मायावती को एक तरह से अघोषित रूप से प्रधानमंत्री पद की दावेदार बता दिया था। मायावती ने इसे स्वीकार भी किया और इस तरह के बयान दिये कि दिल्ली का रास्ता यूपी से ही होकर जाता है। पर वह भूल गयीं कि यूपी से तो मोदी भी चुनाव लड़ रहे थे। बसपा ने कांग्रेस से शुरू से ही दूरी रखी और लगातार इस तरह की भाषा का प्रयोग किया जो दलितों और सवर्णों को लड़ाने तथा मुसलमानों को गोलबंद करने का काम कर सकती थी। सपा की कोशिश भी यही थी कि कांग्रेस से दूर रहा जाए। यह अलग बात है कि सपा के संस्थापक मुलायम सिंह खुद अपने बेटे के निर्णयों से खुश नहीं थे और सार्वजनिक रूप से नाराजगी जता चुके थे। ऐसे में जब अखिलेश और मायावती ने मोदी पर हमला बोला तो उसे जनता ने गंभीरता से नहीं लिया। चुनाव में बसपा की स्थिति जरूर मजबूत हुई पर सपा को फायदा नहीं मिला। और तो और, दोनों इस स्थिति में भी नहीं पहुंच पाये कि केंद्रीय राजनीति में किसी तरह की भूमिका निभा सकें।

एक और बड़बोले विपक्षी नेता राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव पहले तो अपने कुनबे को ही एक नहीं रख पाये, दूसरे वह बेटे को सही दिशा नहीं दे पाये। नतीजा यह कि इस बार उसका खाता तक नहीं खुला। वह कांग्रेस के साथ मिलकर बिहार के रास्ते फिर से केंद्र में सत्ता में आने का सपना देख रहे थे जो चकनाचूर हो गया। एक और बड़बोले विपक्षी नेता चंद्र बाबू नायडू प्रधानमंत्री हम देंगेका दावा करते ही रह गये। केंद्र में किंगमेकर बनना तो दूर वो राज्य में भी अपनी सरकार नहीं बचा सके।

ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में अपने एकछत्र राज्य को लेकर इतनी आश्वस्त रहीं कि मोदी के खिलाफ कुछ भी बोलने से उन्होंने गुरेज नहीं किया। अपनी जुबान पर तो वह काबू रख ही नहीं सकीं, साथ ही चुनाव के दौरान हिंसा, मोदी को बंगाल में घुसने न देने की जिद आदि के कारण उन्हें जनता ने इसबार नकारना शुरू कर दिया है। कोलकाता में विपक्षी दलों की बड़ी रैली करने के बाद भी वह उन्हें एक नहीं कर सकीं। इसके लिए वह कोई कोशिश करती हुई नजर भी नहीं आयीं। कुल मिलाकर स्थिति यही रही कि विपक्षी दल अपनी-अपनी ढफली अपना-अपना राग में व्यस्त रहे। विभक्त और आपस में ही लड़ रहे विपक्ष का लाभ भाजपा को हुआ और वह पहले से भी अधिक मजबूत होकर सामने आयी है।

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