अयोध्या भूमि विवाद पर 17 नवंबर से पहले आ सकता हैं फैसला

बीबीसीखबर, देशUpdated 03-08-2019
अयोध्या

 बीबीसी खबर

सुप्रीम कोर्ट द्वारा छह अगस्त से मामले की रोजाना सुनवाई का निर्णय लेने के बाद इस बात की पूरी संभावना है कि अयोध्या भूमि विवाद पर 17 नवंबर से पहले फैसला आ जाए। दरअसल, मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ इस मामले की सुनवाई करेगी। 

जस्टिस गोगोई चूंकि 17 नवंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं, ऐसे में इस बात की पूरी संभावना है कि इस मामले पर 17 नवंबर से पहले फैसला आ जाए। इसके पीछे वजह है कि अगर जस्टिस गोगोई अपनी सेवानिवृत्ति से पहले इस पर सुनवाई नहीं पूरी कर पाते हैं तो उनकी सेवानिवृत्ति के बाद पीठ में एक नए सदस्य शामिल होंगे। ऐसी स्थिति में नई पीठ को फिर से मामले की सुनवाई करनी पड़ेगी। लिहाजा जस्टिस गोगोई की पूरी कोशिश रहेगी कि वह इस मामले को अंतिम मुकाम तक पहंचाए।

संविधान पीठ ने छह अगस्त से रोजाना सुनवाई करने का निर्णय लिया है। रोजाना सुनवाई का मतलब अमूमन यह होता है कि यह सुनवाई हर हफ्ते मंगलवार, बुधवार और गुरुवार को होगी। यानी 17 नवंबर से पहले अधिकतम 33 दिनों की सुनवाई संभव है।

हालांकि सोमवार और शुक्रवार को भी सुनवाई की जा सकती है। यह देखने वाली बात होगी कि संविधान पीठ किस तरह से सुनवाई करेगी। जस्टिस गोगोई के रुख से भी लगभग साफ है कि वह इस मामले की सुनवाई अपने कार्यकाल में ही पूरा करना चाहते हैं।

सुप्रीम कोर्ट में इलाहाबाद हाईकोर्ट के 30 सितंबर 2010 के फैसले के खिलाफ 14 अपीलें दायर की गई हैं, जिन पर वह सुनवाई करेगा। हाईकोर्ट ने विवादित 2.77 एकड़ भूमि को सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला विराजमान के बीच समान रूप से बंटवारा करने का आदेश दिया था। हालांकि, शीर्ष अदालत ने मई 2011 में हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाने के साथ ही अयोध्या में विवादित स्थल यथास्थिति कायम रखने का आदेश दिया था।

गत आठ मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने इस विवाद का बातचीत के जरिए समाधान निकालने के लिए मध्यस्थता पैनल का गठन किया था। गत 11 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने पैनल को 18 जुलाई तक स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने के लिए कहा है। बाद में मध्यस्थता पैनल को रिपोर्ट दाखिल करने के लिए एक अगस्त तक का वक्त दिया गया था।

पैनल में जस्टिस कलीफुल्ला के अलावा अध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर और मध्यस्थता विशेषज्ञ वरिष्ठ वकील श्रीराम पंचू हैं। शुरुआत से ही अधिकतर हिंदू पक्षकारों का कहना था कि मध्यस्थता के जरिए इसका समाधान नहीं निकल सकता, लिहाजा अदालत को मेरिट के आधार पर सुनवाई करनी चाहिए। इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी मध्यस्थता के जरिए इसका हल निकालने की कोशिश की थी लेकिन उस वक्त भी यह कोशिश नाकाम रही थी।

Follow Us