विपक्षहीनता के इस दौर में

बीबीसीखबर, संपादकीयUpdated 05-08-2019
विपक्षहीनता

 वेद प्रकाश भारद्वाज

कोई दो दशक पहले तक देश में राजनीतिक रूप से ऐसा समय रहा है जब केंद्र में ही नहीं, ज्यादातर राज्यों तक में एक ही पार्टी यानी कांग्रेस का शासन रहा। संसद में किसी एक मजबूत विपक्ष के अभाव में कांग्रेस के लिए शासन आसान रहा परंतु कभी भी चुनौतीविहीन नहीं रहा। उन दिनों भी, जब भाजपा के मात्र दो सांसद थे, और मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में कांग्रेस के मित्र वामपंथी दल हुआ करते थे; कांग्रेस के लिए संसद में बहुमत के बल पर भले ही विधेयक पास करा लेना आसान होता था परंतु विपक्ष संख्याबल में कम होकर भी एक चुनौती की तरह खड़ा रहता था। पिछली लोकसभा में भाजपा के सामने कोई मजबूत विपक्ष नहीं था। कोई मुख्य विपक्षी दल तक नहीं था। इसके बाद भी हमने देखा कि विपक्ष ने कई मुद्दों को लेकर संसद को चलने नहीं दिया था। संसद के अंतिम दो सत्र तो विपक्ष के हंगामे की भेंट चढ़ गये थे और इस बात को लेकर सरकार और विपक्ष दोनों की आलोचना हुई थी। पर इस बार दृश्य एकदम बदला हुआ है। इस बार भी विपक्ष कमजोर है परंतु इस बार कमजोर होने के साथ ही वह अधिक मजबूर और बिखरा हुआ नज़र आ रहा है। यह अप्रत्याशित है कि पिछले साल विधानसभा चुनावों को भाजपा के दो गढ़ों को कब्जाने और लोकसभा में मामूली ही सही, बढ़त लेने के बाद भी कांग्रेस किसी हारे हुए योद्धा की तरह शोक में डूबी नज़र आ रही है। इतनी बेबस और निराश तो भाजपा भी उन दिनों नहीं हुई जब लोकसभा में उसकी केवल दो सीटें थीं।

सत्रहवीं लोकसभा में भाजपा स्पष्ट बहुमत के साथ गठबंधन के तहत पहले से ज्यादा सीटें पाने के बाद भी जितना अपने बहुमत से आश्वस्त नज़र आ रही है उससे कहीं अधिक वह विपक्ष के कमजोर होने से खुश है। पिछले दिनों जिस तरह से लोकसभा के बाद राज्यसभा में, जहां भाजपा और उसका गठबंधन अल्पमत में है, तीन तलाक बिल और अन्य पारित कराने में सफल रही वह उसकी रणनीतिक सफलता कही जा सकती है और विपक्ष की पराजय। कारण कि विपक्ष खुद बिखरा-बिखरा रहा और नेतृत्वहीन भी। इस नेतृत्वहीनता का एक प्रमुख कारण भाजपा के बाद सबसे बड़े दल के रूप में उपस्थित कांग्रेस का नेतृत्वहीन होना है। संसद के दोनों सदनों में उसके नेता हैं परंतु उनमें से कोई भी ऐसा नहीं है जो पार्टी को निर्देशित और नियंत्रित करने का अधिकार रखता हो। यह अधिकार आज भी गांधी परिवार के पास है और खुद गांधी परिवार एक तरह से शोक में डूबा हुआ है।

लोकसभा चुनाव में आशातीत सफलता न मिलने के बाद राहुल गांधी का अध्यक्ष पद से इस्तिफा देना उतनी बड़ी बात नहीं थी जितनी यह कि उन्होंने खुद को एक तरह से पार्टी में निष्क्रिय कर लिया है। संसद और संसद से बाहर सरकार पर वार भले ही वह करते हैं परंतु एक तो उसमें पहले जैसी धार नहीं है और यह विश्वास भी नहीं कि वह सरकार को चुनौती दे सकते हैं। पिछले दो माह से कांग्रेस नये नेतृत्व की तलाश में है जो उसे मिलना मुश्किल है। कारण कि कांग्रेस के पास आज एक भी ऐसा नेता नहीं है जो सभी को स्वीकार्य तो हो ही, साथ ही उसमें पार्टी को सही दिशा देने की ताकत भी हो। ज्यादातर कांग्रेसी नेता, चाहे वह जितने वरिष्ठ हों, आज भी अपने भविष्य के लिए गांधी परिवार की अनुकंपा पर निर्भर हैं। अशोक गहलोत, कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, गुलाम नबी आजाद से लेकर युवा सचिन पायलट, सिंधिया तक ऐसा कोई नहीं जिसके पास पार्टी और देश के लिए गांधी परिवार से अलग भविष्य की कोई कल्पना भी हो।

कांग्रेस की इस बेबसी के बीच अन्य दलों को देखें तो उनमें भी गहरी हताशा नज़र आती है। भाजपा के सहयोगी रहे चंद्रबाबू के सामने आज खुद अपना अस्तित्व बचाने का संकट है। एक समय वह गैर भाजपा मोर्चा बनाने की कवायद में सबसे आगे थे पर उन्हें उनके प्रदेश की जनता ने ही नकार दिया। सपा-बसपा का चुनावपूर्व हुआ गठबंधन केवल अवसरवादी साबित हुआ और चुनाव में उम्मीदें पूरी न होते ही वह न केवल बिखर गया बल्कि दोनों के बीच पहले से अधिक कडुवाहट समा गयी है। सपा में तो वैसे भी पिता-पुत्र के बीच पड़ी खटास ने पार्टी को दो हिस्सों में बांट रखा है। मुलायम तो जब-तब ऐसा लगता है जैसे भाजपा के साथ ही खड़े हैं। ममता बनर्जी को अपना राज्य ही बचाना भारी पड़ रहा है। शरद पवार जैसे कद्दावर नेता आज अपने गृहराज्य में ही अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। एक समय लालू प्रसाद यादव कांग्रेस के साथ मिलकर मजबूत विकल्प का आश्वासन देते कहे जाते थे परंतु उनकी मुसीबत यह है कि एक तो वह अपना परिवार ही एक नहीं रख पाये हैं और दूसरे बिहार में उनका आधार समाप्त होता जा रहा है।

विपक्षहीनता कि इस स्थिति के कारण क्या हैं इसे लेकर कई तर्क-वितर्क दिये जा रहे हैं। चुनावी हार निश्चित ही निराश करती है परंतु अधिक निराशा तब होती है जब आपके पास करने के लिए कुछ होता ही नहीं है। और यह कुछ करने के लिए न होने की स्थिति कोई बाहर से निर्मित नहीं होती, खुद आपकी बनायी होती है। जब राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र नष्ट हो जाता है और उसमें अधिनायकत्व मजबूत हो जाता है तो आगे जीने के लिए उनके पास विकल्प सीमित हो जाते हैं। यदि आज कुछ लोग दबे स्वर में ही सही, यह स्वीकार करने लगे हैं कि देश में इस समय वामपंथी दलों और भाजपा में ही आंतरिक लोकतंत्र बचा है तो कुछ गलत नहीं है। भाजपा में अध्यक्ष पद पर औपचारिक ही सही चुनाव होना, एक व्यक्ति एक पद के सिद्धांत को पालन करना, 75 वर्ष से अधिक उम्र के नेताओं को सेवानिवृत्त कर देना, और सबसे बड़ी बात एक व्यवस्थित संगठन होना उसमें लोकतांत्रिक तत्व का होना प्रमाणित करता है।

इसके विपरीत हम पाते हैं कि चाहे वह कांग्रेस हो या सपा या बसपा या राजद सभी व्यक्ति और परिवार केंद्रित दल हैं। कांग्रेस तो इंदिराजी के समय ही इस बीमारी से ग्रस्त हो गयी थी परंतु जिन दलों ने गैर कांग्रेसवाद के विचार की कोख से जन्म लिया वह भी उसी की नियति के शिकार हो गये हैं। आज भी सपा का अर्थ मुलायम परिवार से अलग कुछ नहीं है, राजद का अर्थ लालू परिवार है और बसपा मायावती के अलावा कुछ नहीं है। क्षेत्रीय दलों की भी यही नियति है। जनता दल युनाइटेड इस बीमारी से बचा हुआ कहा जा सकता है परंतु उसके पास भाजपा या कांग्रेस से जुड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

एक बार फिर दो दशक पहले के राजनीतिक परिदृश्य पर नज़र डालते हैं। उस समय जितने भी दल विपक्ष में हुआ करते थे उनके पास अपनी आर्थिक और राजनीतिक नीतियां व कार्यक्रम हुआ करते थे। विभिन्न मुद्दों को लेकर वह जनता के बीच जाते थे, आंदोलन करते थे। इस तरह समाज में एक राजनीतिक चेतना बनी रहती थी। राजीव गांधी जब विपक्ष में थे तब उन्होंने जनता के साथ सीधे संवाद के लिए यात्राएं कीं। इसके साथ ही वामपंथी दलों से लेकर अन्य दल सरकार की विभिन्न नीतियों की समीक्षा कर अपनी बात जनता के बीच रखते थे। इतना ही नहीं, सरकारी योजनाओं की वास्तविक स्थिति का आकलन करते थे और उसी के आधार पर सरकार को घेरते थे। क्या पिछले कुछ सालों में विपक्ष ने ऐसा कोई आंदोलन किया है जिसे लेकर कहा जा सके कि उससे राजनीतिक चेतना का विस्तार हुआ हो? ले-देकर एससी-एसटी एक्ट के तहत तुरंत गिरफ्तारी की रोक संबंधी न्यायालय के निर्देश के विरोध में हुआ आंदोलन है परंतु उसे भी राजनीतिक दलों ने परवान नहीं चढ़ाया था और इसीलिए उसका लाभ भी उन्हें नहीं मिल पाया। वोट की राजनीति के लिए आरक्षण की मांगों को लेकर हुए आंदोलनों में विपक्ष शामिल हुआ परंतु उसके पास उसे लेकर कोई ठोस नीति थी, यह कभी नज़र नहीं आया। नतीजा यह रहा कि इस तरह के आंदोलन भी क्षणिक प्रभाव वाले प्रमाणित हुए।

इस समय देश कई तरह की समस्याओं का सामना कर रहा है परंतु उन्हें गलत मुद्दों की आड़ में अनदेखा किया जा रहा है। कश्मीर, आतंकवाद, पाकिस्तान के साथ तनाव जैसे मुद्दों के मुकाबले में बढ़ती महंगाई, रोजगार का अभाव, शेयर बाजार का लगातार गिरना, आटो इंडस्ट्री और रियल इस्टेट की खराब हालत, बैंकों का घाटे में जाना, उनका धन डूबना जैसे तमाम मुद्दे हैं जिन्हें लेकर किसी तरह की चिंता विपक्ष में दिखाई नहीं देती है। शिक्षा नीति को लेकर सरकार सक्रिय है परंतु इस बारे में विपक्ष कुछ सोचता है यह दिखाई नहीं देता।

दुर्भाग्य से आज कांग्रेस हो या अन्य दल, उनके पास ऐसा कोई व्यवस्थित सांगठनिक ढांचा नहीं है जो इन मुद्दों को लेकर कोई जन आंदोलन खड़ा कर पाने की स्थिति में हो। जब विपक्ष के पास संसद या विधानसभाओं में शक्ति का अभाव होता है तब जन-शक्ति ही उनके लिए सबसे बड़ा हथियार हो सकती है। इसी हथियार से वह सरकार पर अंकुश लगा सकता है और अपने लिए संभावनाएं भी जगा सकता है। दुर्भाग्य से ऐसा होने की संभावना फिलहाल दिखाई नहीं देती।

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