नियमों के बोझ से टेलीविजन चैनलों की गुणवत्ता हो रही प्रभावित

बीबीसीखबर, संपादकीयUpdated 27-10-2020
नियमों

 आशीष पांडेय   

भारतीय टेलीविजन के दर्शक बीते कुछ महीनों के दौरान टीवी समाचार की गुणवत्ता में लगातार गिरावट देख रहे होंगे। हाल ही में सबके सामने जिस टीआरपी घोटालेका नुमाया किया गया वह तो इस गिरावट का केवल एक उदाहरण भर है। इस प्रकार का घोटालाशायद इतिहास में पहली बार देखा सुना गया है। जिसके कारण न्यूज मीडिया, ब्रॉडकास्टर और विज्ञापनदाताओं के साथ ही सरकार की भूमिका को भी लोग शक की नज़र से देख रहे हैं।

 

टीवी न्यूज चैनल हमेशा से अपनी दर्शकों की संख्या को अधिक बताने का प्रयास करते रहते हैं, क्योंकि उनका कारोबार बहुत हद तक विज्ञापन से होने वाले राजस्व पर निर्भर होता है। यही कारण है कि इन चैनलों का मकसद अधिक से अधिक टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट्स (टीआरपी) हासिल करना होता है। इसी अभिष्ट ने टीआरपी घोटालेको जन्म देकर इस पूरे सिस्टम प्रणाली पर भी सवालिया निशान लगा दिया है। टीआरपी हासिल करने की लोलुपता ही इसके मूल में रही है। जिसके वशीभूत होकर निर्माता व ब्रॉडकास्टरों ने अपने कंटेंट को अर्श से फर्शपर उतारने से भी परहेज नहीं किया। हालांकि इस घटना के पीछे सरकार द्वारा 16 वर्षों से सख्त नियंत्रण को इस सिस्‍टम की परिणति के रूप में देखा जाना कहीं से गलत नहीं है।

 

1991 में नरसिम्हा राव की सरकार ने आर्थिक उदारीकरण को माध्यम बनाकर देश में वित्तीय सुधारों की शुरूआत की। इन्हीं सुधारों के बीच 2004 में भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण’ (TRAI) को दूरसंचार क्षेत्र का एक स्वतंत्र नियामक बना दिया गया। जिसका मूल कार्य योग्यता के आधार पर दूरसंचार क्षेत्र को रेगूलेट करना रहा है। इसका कार्य इसके नाम भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरणको परिभाषित करता है। जिस ट्राई की योग्यता हमेशा से केवल दूरसंचार क्षेत्र में रही, बाद में उसे प्रसारण क्षेत्र की भी जिम्मेदारी अस्थाई तौर पर दे दी गई। इसके बाद दूरसंचार क्षेत्र की अपनी योग्यता का प्रयोग ट्राई ने प्रसारण क्षेत्र में करना शुरू कर दिया। उपभोक्ताओं को बेहतर सुविधा देने के उद्धेश्‍य से ट्राई ने प्रसारण क्षेत्र के विकास और गुणवत्ता में सुधार के प्रयास शुरू कर दिए। बड़ी बात यह रही कि दूरसंचार क्षेत्र की अपनी योग्यताओं को ही ट्राई ने अपने प्रयासों का आधार बनाया। जिस कारण बीते दशकों में टीवी के कंटेंट में गिरावट देखी जा रही है।

 

अधिकांश लोगों को याद होगा कि एक समय हम टीवी मनोरंजन के लिए लोकल केबल ऑपरेटरों पर भी निर्भर थे। लेकिन उस समय देखने लायक उपयोगी व मानक अनुरूप कंटेंट के विकल्प उपलब्ध नहीं थे, और हम इनके अभाव से जूझ रहे थे। ट्राई का उद्देश्य प्रसारण क्षेत्र को विनियमित करने, उपभोक्ताओं को अधिक से अधिक विकल्प देने, पारदर्शिता लाने और टीवी सेवाओं को अधिक किफायती बनाने का होना चाहिए था। लेकिन तात्कालिक कार्यप्रणाली और मौजूदा परिस्थितियों की समीक्षा करें, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि ट्राई इन मुद्दों को सही तरीके से लागू नहीं कर पाया।

 

यद्यपि ट्राई की जिम्मेदारी इन तीन मुदृदों जिनमें टैरिफ, उपभोक्ताओं को प्रदान की जाने वाली सेवाओं की गुणवत्ता के अलावा ब्रॉडकास्टर और वितरकों जैसे कि एमएसओ, एलसीओएस, एचआईटीएस और डीटीएच ऑपरेटरों के बीच परस्पर संपर्क स्थापित करना होना चाहिए था। लेकिन इस नियामक ने अपना पूरा ध्यान केवल टैरिफ पर ही केंद्रित रखा है। ट्राई द्वारा टीवी चैनलों के मूल्य निर्धारण पर अंकुश लगाने से प्रसारण क्षेत्र के उस रिटर्न ऑफ इंवेस्टमेंट पर भी असर पड़ा, जो सब्सक्रिप्शन व विज्ञापन के राजस्व पर निर्भर था। ट्राई के इस दृष्टिकोण के कारण ही चैनलों ने विज्ञापन राजस्व पर अपनी निर्भरता बढ़ा दी।

 

गौर करने वाली बात यह है कि 2019 में जहां सभी कुल विज्ञापनों का 37% सिर्फ टीवी पर खर्च किया गया, वहीं ट्राई द्वारा मार्च 2019 में पेश किए गए नए टैरिफ ने उपभोक्तओं का टीवी देखने के लिए देखने वाले खर्च को 25% तक बढ़ा दिया। जिसकी वजह से लगभग 2 करोड़ 60 लाख टीवी ग्राहकों ने अपने सब्सक्रिप्शन को समाप्त कर दिया। जिससे इस सेक्टर को 8500 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा। इसके अलावा, टेलीविजन रेटिंग के कारण चैनलों के वित्तीय फैसले, कार्यक्रमों का उत्पादन और इनकी समय-सारणी भी काफी हद तक प्रभावित कर दी थी।

 

इसके बाद 2008 में ट्राई ने ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (बार्क) के गठन के माध्यम से स्व-नियमन के दृष्टिकोण की सिफारिश की। इस सिफारिश के बाद बार्क को सरकारी मान्यता प्राप्त टेलीविजन रेटिंग एजेंसी बना दिया गया। इसके बाद बार्क ने मीडिया इंडस्ट्री के लिए एक रिपोर्ट जारी की जिसका नाम दिया गया व्हाट इंडिया वॉचेस अर्थात भारत के दर्शक क्या देखते हैं। वर्तमान में बार्क 40,000 घरों से टीवी के सैंपल लेता है जबकि देशभर में कुल 15.35 करोड़ घरों में टीवी देखा जाता है।

 

टीवी व्यूअरशिप हासिल करने के लिए इन 40 हजार घरों में टीवी उपकरण पर चलने वाले कंटेंट को पीपूलमीटरट्रैकिंग डिवाइस द्वारा ट्रैक किया जाता है। जिससे टीवी दर्शकों की संख्या का अनुमान लगाने में आसानी होती है। यहां एक बात गौर करने वाली यह है कि कुछ छोटे चैनल, उदाहरण के रूप में न्यूज चैनल जो सब्सक्रिप्शन की श्रेणी में नहीं आते और पूरी तरह से विज्ञापन से होने वाले आय पर ही निर्भर होते हैं। तो इनके द्वारा अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए रेटिंग सिस्टम के बारे में भ्रांतियां फैलाईं जाती हैं।

 

 

 

आज के दौर को देखते हुए यह लगता है कि ट्राई जैसे नियामक को प्रसारण क्षेत्र में सेवा और कंटेंट की गुणवत्ता को प्राथमिकता देने पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है। साथ ही सभी स्टेकहोल्डर्स जैसे प्रसारकों, वितरकों और उपभोक्ताओं के हितों पर विचार करने के लिए एक स्थिर और सामंजस्यपूर्ण नीति की भी आवश्यकता है। इसके अलावा, बॉडकास्टरों के चैनलों के सब्सक्रिप्शन की कीमत इस बात पर भी निर्भर होनी चाहिए कि उसके कंटेंट को तैयार करने में कितना निवेश किया गया है। इससे उपभोक्ताओं को गुणवत्ता वाले कंटेंट उपलब्ध कराने के लिए वितरकों को मजबूर होना पड़ेगा।

 

यह बात हमें समझनी होगी कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसारकों को जो राजस्व प्राप्त होता है, उसमें सब्सक्रिप्शन और विज्ञापन से होने वाले आय का अनुपात 70:30 का होता है। लेकिन भारत में ट्राई द्वारा डिजिटलीकरण और नियमों के ढेरों कार्यान्वयन के बाद भी प्रसारकों के साथ सरकारी खजाने और उपभोक्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। जिसके कारण भारत में टेलीविजन चैनल, विज्ञापन से होने वाले आय पर काफी हद तक निर्भर हैं। यही कारण है कि वह चाहते हैं कि अधिक से अधिक लोग उनके चैनल देखें। इन सब कारणों के वजह से हाल में टीवी कंटेंट में गिरावट देखने को मिल रही है।

 

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